Q.1 भरतनाट्यम के संदर्भ में निम्नलिखित मेँ से क्या सही है ? 1) इस नृत्य के रूप मेँ कोई शब्द नहीं है, लेकिन मूड की विविधता की विशेषता के साथ शुद्ध नृत्य दृश्यों से बना है 2) भरतनाट्यम अभिनय पर और भ्रमण पर अधिक झुकाव डालता है 3) जातीस्वरम, शब्दम ,वर्नम और तिल्लाना भरतनाट्यम के रूप हैं Codes: A) 1 & 3 B) 2 & 3 C) 1 & 2 D) 1,2,3 उत्तर डी भरतनाट्यम नृत्य शास्त्रीय नृत्य का एक प्रसिद्ध नृत्य है। भरत नाट्यम, भारत के प्रसिद्ध नृत्योंए में से एक है तथा इसका संबंध दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्यृ से है। यह नाम 'भरत' शब्दद से लिया गया तथा इसका संबंध नृत्यृशास्त्र से है। ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा, हिन्दू देवकुल के महान त्रिदेवों में से प्रथम, नाट्य शास्त्रन अथवा नृत्यह विज्ञान हैं। इन्द्रू व स्व र्ग के अन्यन देवताओं के अनुनय-विनय से ब्रह्मा इतना प्रभावित हुआ कि उसने नृत्यै वेद सृजित करने के लिए चारों वेदों का उपयोग किया। नाट्य वेद अथवा पंचम वेद, भरत व उसके अनुयाइयों को प्रदान किया गया जिन्होंउने इस विद्या का परिचय पृथ्वीउ के नश्वोर मनुष्यों को दिया। अत: इसका नाम भरत नाट्यम हुआ। भरत नाट्यम में नृत्ये के तीन मूलभूत तत्वोंं को कुशलतापूर्वक शामिल किया गया है। ये हैं- भाव अथवा मन:स्थिति, राग अथवा संगीत और स्व्रमार्धुय और ताल अथवा काल समंजन। भरत नाट्यम की तकनीक में हाथ, पैर, मुख व शरीर संचालन के समन्व यन के 64 सिद्धांत हैं, जिनका निष्पा,दन नृत्य पाठ्यक्रम के साथ किया जाता है। मूल तत्व भरत नाट्यम में जीवन के तीन मूल तत्वु – दर्शन शास्त्र , धर्म व विज्ञान हैं। यह एक गतिशील व सांसारिक नृत्य शैली है, तथा इसकी प्राचीनता स्वपयं सिद्ध है। इसे सौंदर्य व सुरुचि संपन्नमता का प्रतीक बताीया जाना पूर्णत: संगत है। वस्तु्त: यहे एक ऐसी परंपरा है, जिसमें पूर्ण समर्पण, सांसारिक बंधनों से विरक्ति तथा निष्पांदनकर्ता का इसमें चरमोत्कार्ष पर होना आवश्य्क है। भरत नाट्यम तुलनात्म‍क रूप से नया नाम है। पहले इसे सादिर, दासी अट्टम और तन्जातवूरनाट्यम के नामों से जाना जाता था। मुद्राएं विगत में इसका अभ्याटस व प्रदर्शन नृत्यांागनाओं के एक वर्ग जिन्‍‍हें 'देवदासी' के रूप में जाना जाता है, द्वारा मंदिरों में किया जाता था। भरत नाट्यम के नृत्येकार मुख्यमत: महिलाएं हैं, वे मूर्तियों के अनुसार अपनी मुद्राएं बनाती हैं, सदैव घुटने मोड़ कर नृत्यख करती हैं। यह नितांत परिशुद्ध शैली है, जिसमें मनोदशा व अभिव्यंोजना संप्रेषित करने के लिए हस्ति संचालन का विशाल रंगपटल प्रयोग किया जाता है। भरत नाट्यम अनुनादी है तथा इसमें नर्तक को बहुत मेहनत करनी पड़ती है। शरीर ऐसा जान पड़ता है मानो त्रिभुजाकार हो, एक हिस्साि धड़ से ऊपर व दूसरा नीचे। यह, शरीर भार के नियंत्रित वितरण, व निचले अंगों की सुदृढ़ स्थिति पर आधारित होता है, ताकि हाथों को एक पंक्ति में आने, शरीर के चारों ओर घुमाने अथवा ऐसी स्थितियाँ बनाने, जिससे मूल स्थिति और अच्छी हो, में सहूलियत हो। Q.2 कथकली से संबंधित निम्नलिखित बयानों मेँ से कौन सा बयान सही है ? 1) वर्ग और आयताकार पद सामान्यतः कथकली में देखे जाते हैँ 2) शरीर का वजन पैरों के बाहरी किनारों पर होता है जो कि थोड़ा झुका हुआ और घुमावदार होता है 3) चेहरे का भाव, आंख की गेंदों और आँखोँ की पलकोँ के द्वारा हरकत, इसकी विशेषताहै Codes: A) 1 & 3 B) 2 & 3 C) 1 & 2 D) 1,2,3 उत्तर। डी कथकली नृत्य केरल के दक्षिण-पश्चिमी राज्य का एक समृद्ध और फलने-फूलने वाला शास्त्रीय नृत्य तथा यहाँ की परम्पारा है। 'कथकली' का अर्थ है- 'एक कथा का नाटक' या 'एक नृत्यत नाटिका'। 'कथा' का अर्थ है- 'कहानी'। इस नृत्य में अभिनेता रामायण और महाभारत के महाग्रंथों और पुराणों से लिए गए चरित्रों का अभिनय करते हैं। यह अत्यं त रंग-बिरंगा नृत्य है। इसके नर्तक उभरे हुए परिधानों, फूलदार दुपट्टों, आभूषणों और मुकुट से सजे होते हैं। वे उन विभिन्नर भूमिकाओं को चित्रित करने के लिए सांकेतिक रूप से विशिष्टर प्रकार का रूप धरते हैं, जो वैयक्तिक चरित्र के बजाए उस चरित्र के अधिक नज़दीक होते हैं। कथा नृत्य भारतीय नृत्य रूपों में अद्वितीय कथकली नृत्य केरल का शास्त्रीय नृत्य नाटक है। ज्वलंत और समृद्व विशेषताओं जैसे हाथों के साथ गाना, भाव में प्राकृतिक और प्रभावशाली, हलचल में सुंदर और तालबद्व, नृत्य में मनमोहक और सबसे ख़ास कल्पना के स्तर पर मनभावन के कारण भारतीय नृत्य कलाओं में कथकली को उच्च दर्जा प्राप्त है। विषयों के आधार पर कथकली प्राचीन पुराणों की कथाओं पर आधारित है। अगर इसकी पुरातन वेशभूषा, अजीबो-गरीब रूप सज्जा ओर भव्यआभूषणों को देखें तो हम पायेंगे कि कथकली भारत का एकमात्र ऐसा नृत्य है, जो अपनी मर्दाना पहलू की मौलिक ताकत पर संरक्षित है। इतिहास कथकली के बारे मे यह माना जाता है कि यह 300 या 400 साल पुरानी कला नहीं हैं, इसकी वास्तविक उत्पत्ति 1500 साल पहले से है। कथकली विकास की एक लंबी प्रक्रिया से गुजरी है और इसकी इस यात्रा ने केरल में कई अन्य मिश्रित कलाओं के जन्म और विकास का मार्ग भी प्रशस्त किया है। कथकली को आर्यन और द्रविड सभ्यता के प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसने अनुष्ठान और संस्कृतियों को समझते हुए उनके साथ मिलकर इन सभ्यताओं से नाटक और नृत्य की इस कला को उधार लिया। कथकली के इतिहास के पुनर्निर्माण में यह बात ध्यान रखना आवश्यक है कि व्यवहारिक रूप से सभी प्रकार के औपचारिक नृत्य, नाटक और नृत्य नाटक की सभी कलाओं को अस्तित्व में लाने का श्रेय कथकली को ही जाता है। एक अध्ययन के दौरान यह साबित भी हो चुका है कि केरल के सभी प्रारंभिक नृत्य और नाटक जैसे- 'चकइरकोथू' और 'कोडियाट्टम', कई धार्मिक नृत्य जो भगवती पंथ से संबंधित है जैसे- 'मुडियाअट्टू', 'थियाट्टम' और 'थेयाम', सामाजिक, धार्मिक और वैवाहित नृत्य जैसे- 'सस्त्राकली' और 'इजामट्क्कली' और बाद में विकसित नृत्य जैसे- 'कृष्णाअट्टम' और 'रामाअट्टम' आदि कथकली की ही देन हैं। कथकली कला में कई नृत्य और नाटकों की विशेषताओं को शामिल किया जा सकता है और यह वर्णन करने में भी आसान है कि कथकली इन रूपों के प्रारंभ में ही विकसित हो चुकी थी। मूकाभिनय सम्पूर्ण कला कथकली अभिनय, 'नृत्य' (नाच) और 'गीता' (संगीत) तीन कलाओं से मिलकर बनी एक संपूर्ण कला है। यह एक मूकाभिनय है, जिसमें अभिनेता बोलता एवं गाता नहीं है, लेकिन बेहद संवेदनशील माध्यमों जैसे- हाथ के इशारे और चेहरे की भावनाओं के सहारे अपनी भावनाओं की सुगम अभिव्यक्ति देता है। कथकली नाटकीय और नृत्य कला दोनों है। परंतु मुख्य तौर पर यह नाटक है। यह साधारण नाटकीय कला से कहीं ज्यादा अच्छा प्रस्तुतीकरण है। यह यथार्थवादी कला नहीं है, लेकिन अपनी कल्पनाशीलता के चलते यह 'भरत नाट्यशास्त्र' के समानांनतर है। प्रत्येक भावना आदर्शवादी तरीके से गहन जीवंतता के साथ चेहरे के भावों द्वारा व्यक्त की जाती है तथा यह शब्दों के अभाव की भी पूर्ति करती है। चेहरे पर व्यक्त प्रत्येक अभिव्यक्ति नृत्य की लय और संगीत की ताल के साथ छायांकित होती है। नृत्य में अभिनय केवल मानवीय हृदय की भावनाओं की व्यक्तिपरक अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति, चित्र, जीव और आसपास की वस्तुओं की संबंधों के अनुसार उद्वेशयपरक अभिव्यक्ति है। इसमें वास्तव में कला के माध्यम से प्रतिरूपण शामिल है और कथकली का सचित्र वैभव और काव्य गौरव गाथा का प्रस्तुतीकरण भी शामिल है। कथकली में संगीत एक महत्त्वपूर्ण एवं अनिवार्य तत्व है। इसमें ऑर्केस्ट्रा दो मुखर संगीतकारों द्वारा बनाया जाता है, इनमें से एक 'चेंगला' नामक यंत्र के साथ गीत की तैयारी करता है और दूसरा 'झांझ' और 'मंजीरा' के साथ मिलकर 'इलाथम' नामक जोड़ी की रचना करता है, जिसमें चेन्दा और मदालम भी प्रमुख स्थान रखते हैं। 'चेन्दा' एक बेलनाकार ढोल होता है, जो उंची लेकिन मीठी आवाज निकालता है, जबकि 'मदालम' मृदंग का बडा रूप होता है। गायन शैली कथकली संगीत की गायन शैली को एक विशिष्ट सोपान शैली में विकसित किया गया है, जिसकी गति बहुत धीमी होती है। इसमें न ही राग और राग अलापना है और न ही निरावल और सरावल प्रकार से उनका विस्तारण करना है। रागों की व्यापक सुविधाओं के संरक्षण और ताल का सावधानी से पालन करते हुए वे अभिनेता को अभिनय करने की पूरी गुजांइश छोड़ते हुए गाना गाते हैं। कथकली में दो मुख्य संगीतकार होते हैं, जिसमें मुख्य संगीतकार को 'पोनानी' और दूसरे को 'सिनकिडी' के नाम से जाना जाता है। कथकली गायन उच्च काव्य उच्चारण में से है, जिन्हें मलयालम साहित्य के रत्नों में गिना जाता है। 'मुद्रास' अर्थात 'हाथ के इशारे' को शाब्दिक भाषा के विकल्प के तौर पर प्रयोग किया जाता है, लेकिन इससे ज्यादा इसे इस्तेमाल नहीं किया जाता, न ही नाटक में और न ही नृत्य में। चेन्दा के साथ संगत करने के लिए मदालम, चेंगला और इथालम का प्रयोग संगीतकारों के द्वारा किया जाता है, इसके साथ अभिनेता के द्वारा चेहरे के हाव भाव, शारीरिक व्यवहार, अंगुलियों की भाषा और हाथों के इशारों के माध्यम से संगीत का अनुवाद भी किया जाता है। जैसे ही गाने की शुरूआत होती है, अभिनेता अपने मूकाभिनय के साथ और अपने इशारों के माध्यम से ऐसी अभिव्यक्ति करता है, जिससे दर्शक सपनों की दुनिया में अपने आप को महसूस करता है। अभिनेता गाने के शब्दों और ताल के साथ नाटक और नृत्य करता है। मुद्रास कला नृत्य और अभिनय का एक अभिन्न हिस्सा है। कथकली के अधिकांश चरित्र पौराणिक होते हैं, इसलिए उनकी रूप सज्जा यथार्थवादी आधार पर नहीं होती है। इन सभी में रूप सज्जा, पोशाक और शृंगार के पांच विभिन्न प्रकार तय किए हैं, जो उनके वास्तविक चरित्र और गुणों का वर्णन करते हैं। विशेषताएँ नृत्य में मानव, देवता समान, दैत्यच आदि को शानदार वेशभूषा और परिधानों के माध्य म से प्रदर्शित किया जाता है। इस नृत्ये का सबसे अधिक प्रभावशाली भाग यह है कि इसके चरित्र कभी बोलते नहीं हैं, केवल उनके हाथों के हाव भाव की उच्चै विकसित भाषा तथा चेहरे की अभिव्य क्ति होती है, जो इस नाटिका के पाठ्य को दर्शकों के सामने प्रदर्शित करती है। उनके चेहरे के छोटे और बड़े हाव भाव, भंवों की गति, नेत्रों का संचलन, गालों, नाक और ठोड़ी की अभिव्य क्ति पर बारीकी से काम किया जाता है तथा एक कथकली अभिनेता नर्तक द्वारा विभिन्नो भावनाओं को प्रकट किया जाता है। इसमें अधिकांशत: पुरुष ही महिलाओं की भूमिका निभाते हैं, जबकि अब कुछ समय से महिलाओं को कथकली में शामिल किया जाने लगा है। वर्तमान समय का कथकली एक नृत्य नाटिका की परम्पसरा है, जो केरल के नाट्य कर्म की उच्चक विशिष्ट शैली की परम्पपरा के साथ शताब्दियों पहले विकसित हुआ था, विशेष रूप से कुडियाट्टम। पारम्पररिक रीति रिवाज जैसे थेयाम, मुडियाट्टम और केरल की मार्शल कलाएँ नृत्यक को वर्तमान स्व‍रूप में लाने के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। Q.3 प्राचीन भारत के इतिहास, के संदर्भ में बौद्ध धर्म और जैन धर्म से सम्बंधित निम्नलिखित मेँ से क्या सम्मानताएँ थी ? 1) तपस्या और भोग के प्रति बचाव 2) वेदों के अधिकार के प्रति भेदभाव 3) धर्म की क्षमता को अस्वीकारना Codes: A) 1 & 2 B) 2 & 3 C) 1 & 3 D) 1,2,3 उत्तर। बी बौद्ध धर्म: बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है। इसके संस्थापक भगवान बुद्ध, शाक्यमुनि (गौतम बुद्ध) थे। बुद्ध राजा शुद्धोदन के पुत्र थे और इनका जन्म लुंबिनी नामक ग्राम (नेपाल) में हुआ था। वे छठवीं से पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व तक जीवित थे। उनके गुज़रने के बाद अगली पाँच शताब्दियों में, बौद्ध धर्म पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ैला, और अगले दो हज़ार सालों में मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी जम्बू महाद्वीप में भी फ़ैल गया। आज, बौद्ध धर्म में तीन मुख्य सम्प्रदाय हैं: थेरवाद, महायान और वज्रयान। बौद्ध धर्म को पैंतीस करोड़ से अधिक लोग मानते हैं और यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है। मुख्य सम्प्रदाय बौद्ध धर्म में दो मुख्य सम्प्रदाय हैं: थेरवाद थेरवाद या हीनयान बुद्ध के मौलिक उपदेश ही मानता है। महायान महायान बुद्ध की पूजा करता है। ये थेरावादियों को "हीनयान" (छोटी गाड़ी) कहते हैं। बौद्ध धर्म की एक प्रमुख शाखा है जिसका आरंभ पहली शताब्दी के आस-पास माना जाता है। ईसा पूर्व पहली शताब्दी में वैशाली में बौद्ध-संगीति हुई जिसमें पश्चिमी और पूर्वी बौद्ध पृथक् हो गए। पूर्वी शाखा का ही आगे चलकर महायान नाम पड़ा। देश के दक्षिणी भाग में इस मत का प्रसार देखकर कुछ विद्वानों की मान्यता है कि इस विचारधारा का आरंभ उसी अंचल से हुआ। महायान भक्ति प्रधान मत है। इसी मत के प्रभाव से बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण आंरभ हुआ। इसी ने बौद्ध धर्म में बोधिसत्व की भावना का समावेश किया। यह भावना सदाचार, परोपकार, उदारता आदि से सम्पन्न थी। इस मत के अनुसार बुद्धत्व की प्राप्ति सर्वोपरि लक्ष्य है। महायान संप्रदाय ने गृहस्थों के लिए भी सामाजिक उन्नति का मार्ग निर्दिष्ट किया। भक्ति और पूजा की भावना के कारण इसकी ओर लोग सरलता से आकृष्ट हुए। महायान मत के प्रमुख विचारकों में अश्वघोष, नागार्जुन और असंग के नाम प्रमुख हैं। ब्रज (मथुरा) में बौद्ध धर्म मथुरा और बौद्ध धर्म का घनिष्ठ संबंध था। जो बुद्ध के जीवन-काल से कुषाण-काल तक अक्षु्ण रहा। 'अंगुत्तरनिकाय' के अनुसार भगवान बुद्ध एक बार मथुरा आये थे और यहाँ उपदेश भी दिया था। 'वेरंजक-ब्राह्मण-सुत्त' में भगवान् बुद्ध के द्वारा मथुरा से वेरंजा तक यात्रा किए जाने का वर्णन मिलता है।पालि विवरण से यह ज्ञात होता है कि बुद्धत्व प्राप्ति के बारहवें वर्ष में ही बुद्ध ने मथुरा नगर की यात्रा की थी। मथुरा से लौटकर बुद्ध वेरंजा आये फिर उन्होंने श्रावस्ती की यात्रा की। भगवान बुद्ध के शिष्य महाकाच्यायन मथुरा में बौद्ध धर्म का प्रचार करने आए थे। इस नगर में अशोक के गुरुउपगुप्त, ध्रुव (स्कंद पुराण, काशी खंड, अध्याय 20), एवं प्रख्यात गणिका वासवदत्ता भी निवास करती थी। मथुरा राज्य का देश के दूसरे भागों से व्यापारिक संबंध था। मथुरा उत्तरापथ और दक्षिणापथ दोनों भागों से जुड़ा हुआ था। राजगृह से तक्षशिला जाने वाले उस समय के व्यापारिक मार्ग में यह नगर स्थित था। बौद्ध मूर्तियाँ मथुरा के कुषाण शासक जिनमें से अधिकांश ने बौद्ध धर्म को प्रोत्साहित किया मूर्ति निर्माण के पक्षपाती थे। यद्यपि कुषाणों के पूर्व भी मथुरा में बौद्ध धर्म एवं अन्य धर्म से सम्बन्धित प्रतिमाओं का निर्माण किया गया था। विदित हुआ है कि कुषाण काल में मथुरा उत्तर भारत में सबसे बड़ा मूर्ति निर्माण का केन्द्र था और यहाँ विभिन्न धर्मों सम्बन्धित मूर्तियों का अच्छा भण्डार था। इस काल के पहले बुद्ध की स्वतंत्र मूर्ति नहीं मिलती है। बुद्ध का पूजन इस काल से पूर्व विविध प्रतीक चिह्नों के रूप में मिलता है। परन्तु कुषाण काल के प्रारम्भ से महायान भक्ति, पंथ भक्ति उत्पत्ति के साथ नागरिकों में बुद्ध की सैकड़ों मूर्तियों का निर्माण होने लगा। बुद्ध के पूर्व जन्म की जातक कथायें भी पत्थरों पर उत्कीर्ण होने लगी। मथुरा से बौद्ध धर्म सम्बन्धी जो अवशेष मिले हैं, उनमें प्राचीन धार्मिक एवं लौकिक जीवन के अध्ययन की अपार सामग्री है। मथुरा कला के विकास के साथ–साथ बुद्ध एवं बौधित्सव की सुन्दर मूर्तियों का निर्माण हुआ। गुप्तकालीन बुद्ध प्रतिमाओं में अंग प्रत्यंग के कला पूर्ण विन्यास के साथ एक दिव्य सौन्दर्य एवं आध्यात्मिक गांभीर्य का समन्वय मिलता है। बौद्ध धर्म के अनुयायी ह्वेन त्सांग भारत में ह्वेन त्सांग ने बुद्ध के जीवन से जुड़े सभी पवित्र स्थलों का भ्रमण किया और उपमहाद्वीप के पूर्व एवं पश्चिम से लगे इलाक़ो की भी यात्रा की। उन्होंने अपना अधिकांश समय नालंदा मठ में बिताया, जो बौद्ध शिक्षा का प्रमुख केंद्र था, जहाँ उन्होंने संस्कृत, बौद्ध दर्शन एवं भारतीय चिंतन में दक्षता हासिल की। इसके बाद ह्वेन त्सांग ने अपना जीवन बौद्ध धर्मग्रंथों के अनुवाद में लगा दिया जो 657 ग्रंथ थे और 520 पेटियों में भारत से लाए गए थे। इस विशाल खंड के केवल छोटे से हिस्से (1330 अध्यायों में क़रीब 73 ग्रंथ) के ही अनुवाद में महायान के कुछ अत्यधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ शामिल हैं। मिलिंद (मिनांडर) उत्तर-पश्चिम भारत का 'हिन्दी-यूनानी' राजा 'मनेन्दर' 165-130 ई. पू. लगभग ( भारतीय उल्लेखों के अनुसार 'मिलिन्द') था। प्रथम पश्चिमी राजा जिसने बौद्ध धर्म अपनाया और मथुरा पर शासन किया। भारत में राज्य करते हुए वह बौद्ध श्रमणों के सम्पर्क में आया और आचार्य नागसेन से उसने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। बौद्ध ग्रंथों में उसका नाम 'मिलिन्द' आया है। 'मिलिन्द पञ्हो' नाम के पालि ग्रंथ में उसके बौद्ध धर्म को स्वीकृत करने का विवरण दिया गया है। मिनान्डर के अनेक सिक्कों पर बौद्ध धर्म के 'धर्मचक्र' प्रवर्तन का चिह्न 'धर्मचक्र' बना हुआ है । अशोक सम्राट अशोक को अपने विस्तृत साम्राज्य के बेहतर कुशल प्रशासन तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जाना जाता है। जीवन के उत्तरार्ध में अशोक गौतम बुद्धके भक्त हो गए और उन्हीं (महात्मा बुद्ध) की स्मृति में उन्होंने एक स्तम्भ खड़ा कर दिया जो आज भी नेपाल में उनके जन्मस्थल-लुम्बिनी में मायादेवी मन्दिर के पास अशोक स्तलम्भउ के रूप में देखा जा सकता है। उसने बौद्ध धर्म का प्रचार भारत के अलावा श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान, पश्चिम एशिया, मिस्र तथायूनान में भी करवाया। अशोक के अभिलेखों में प्रजा के प्रति कल्याणकारी द्रष्टिकोण की अभिव्यक्ति की गई है। फ़ाह्यान फ़ाह्यान का जन्म चीन के 'वु-वंग' नामक स्थान पर हुआ था। यह बौद्ध धर्म का अनुयायी था। उसने लगभग 399 ई. में अपने कुछ मित्रों 'हुई-चिंग', 'ताओंचेंग', 'हुई-मिंग', 'हुईवेई' के साथ भारत यात्रा प्रारम्भ की। फ़ाह्यान की भारत यात्रा का उदेश्य बौद्ध हस्तलिपियों एवं बौद्ध स्मृतियों को खोजना था। इसीलिए फ़ाह्यान ने उन्ही स्थानों के भ्रमण को महत्त्व दिया, जो बौद्ध धर्म से सम्बन्धित थे। कनिष्क कुषाण राजा कनिष्क के विशाल साम्राज्य में विविध धर्मों के अनुयायी विभिन्न लोगों का निवास था, और उसने अपनी प्रजा को संतुष्ट करने के लिए सब धर्मों के देवताओं को अपने सिक्कों पर अंकित कराया था। पर इस बात में कोई सन्देह नहीं कि कनिष्क बौद्ध धर्म का अनुयायी था, और बौद्ध इतिहास में उसका नाम अशोक के समान ही महत्त्व रखता है। आचार्य अश्वघोष ने उसे बौद्ध धर्म में दीक्षित किया था। इस आचार्य को वह पाटलिपुत्र से अपने साथ लाया था, और इसी से उसने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। जैन धर्म: जैन धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है। 'जैन' उन्हें कहते हैं, जो 'जिन' के अनुयायी हों। 'जिन' शब्द बना है 'जि' धातु से। 'जि' यानी जीतना। 'जिन' अर्थात जीतने वाला। जिन्होंने अपने मन को जीत लिया, अपनी वाणी को जीत लिया और अपनी काया को जीत लिया, वे हैं 'जिन'। जैन धर्म अर्थात 'जिन' भगवान का धर्म। वस्त्र-हीन बदन, शुद्ध शाकाहारी भोजन और निर्मल वाणी एक जैन-अनुयायी की पहली पहचान है। यहाँ तक कि जैन धर्म के अन्य लोग भी शुद्ध शाकाहारी भोजन ही ग्रहण करते हैं तथा अपने धर्म के प्रति बड़े सचेत रहते हैं। मतभेद तथा विभाजन मौर्य सम्राट अशोक के अभिलेखों से यह पता चलता है कि उसके समय में मगध में जैन धर्म का प्रचार था। लगभग इसी समय मठों में बसने वाले जैन मुनियों में यह मतभेद शुरू हुआ कि तीर्थंकरों की मूर्तियाँ कपड़े पहनाकर रखी जाएँ या नग्न अवस्था में। इस बात पर भी मतभेद था कि जैन मुनियों को वस्त्र पहनना चाहिए या नहीं। आगे चलकर यह मतभेद और भी बढ़ गया। ईसा की पहली सदी में आकर जैन मतावलंबी मुनि दो दलों में बंट गए। एक दल 'श्वेताम्बर' और दूसरा दल 'दिगम्बर' कहलाया। 'श्वेताम्बर' और 'दिगम्बर' इन दोनों संप्रदायों में मतभेद दार्शनिक सिद्धांतों से अधिक चरित्र को लेकर है। दिगम्बर आचरण पालन में अधिक कठोर माने जाते हैं, जबकि श्वेताम्बर कुछ उदार हैं। श्वेताम्बर संप्रदाय के मुनि श्वेत वस्त्र धारण करते हैं, जबकि दिगम्बर मुनि निर्वस्त्र रहकर साधना करते हैं। यह नियम केवल मुनियों पर लागू होता है। दिगम्बर संप्रदाय यह मानता है कि मूल आगम ग्रंथ लुप्त हो चुके हैं, 'कैवल्य ज्ञान' प्राप्त होने पर सिद्ध को भोजन की आवश्यकता नहीं रहती और स्त्री शरीर से 'कैवल्य ज्ञान' संभव नहीं है; किंतु श्वेताम्बर संप्रदाय ऐसा नहीं मानते हैं। शाखाएँ जैन धर्म की दिगम्बर शाखा में तीन शाखाएँ हैं- मंदिरमार्गी मूर्तिपूजक तेरापंथी श्वेताम्बर में शाखाओं की संख्या दो है- मंदिरमार्गी स्थानकवासी दिगम्बर संप्रदाय के मुनि वस्त्र नहीं पहनते। 'दिग्‌' अर्थात दिशा। दिशा ही अंबर है, जिसका वह 'दिगम्बर'। वेदों में भी इन्हें 'वातरशना' कहा गया है। जबकि श्वेताम्बर संप्रदाय के मुनि सफ़ेद वस्त्र धारण करते हैं। लगभत तीन सौ वर्षों पहले श्वेताम्बरों में ही एक अन्य शाखा और निकली 'स्थानकवासी'। ये लोग मूर्तियों की पूजा नहीं करते हैं। जैनियों की अन्य शाखाओं में 'तेरहपंथी', 'बीसपंथी', 'तारणपंथी' और 'यापनीय' आदि कुछ और भी उप-शाखाएँ हैं। जैन धर्म की सभी शाखाओं में थोड़ा-बहुत मतभेद होने के बावजूद भगवान महावीर तथा अहिंसा, संयम और अनेकांतवाद में सबका समान विश्वास है। धर्म का प्रचार-प्रसार ईसा की पहली शताब्दीं में कलिंग के राजा खारवेल ने जैन धर्म स्वीकार किया। ईसा की आरंभिक सदियों में उत्तर में मथुरा और दक्षिण में मैसूर जैन धर्म के बहुत बड़े केंद्र थे। पाँचवीं से बारहवीं शताब्दीं तक दक्षिण के गंग, कदम्ब, चालुक्य और राष्ट्रकूटराजवंशों ने जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में बहुत सहयोग एवं सहायता प्रदान की। इन राजाओं के यहाँ अनेक जैन कवियों को आश्रय एवं सहायता प्राप्त थी। ग्याहरवीं सदी के आस-पास चालुक्य वंश के राजा सिद्धराज और उनके पुत्र कुमारपाल ने जैन धर्म को राजधर्म बना दिया तथा गुजरात में उसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया। हिन्दी के प्रचलन से पूर्व अपभ्रंश भाषा का प्रयोग होता था। अपभ्रंश भाषा के कवि, लेखक एवं विद्वान हेमचन्द्र इसी समय के थे। हेमचन्द्रराजा कुमारपाल के दरबार में ही थे। सामान्यत: जैन मतावलंबी शांतिप्रिय स्वभाव के होते थे। इसी कारण मुग़ल काल में इन पर अधिक अत्याचार नहीं हुए। उस समय के साहित्य एवं अन्य विवरणों से प्राप्त जानकारियों के अनुसार अकबर ने जैन अनुयाइयों की थोड़ी बहुत मदद भी की थी। किंतु धीरे-धीरे जैनियों के मठ टूटने एवं बिखरने लगे। जैन धर्म मूलत: भारतीय धर्म है। भारत के अतिरिक्त पूर्वी अफ़्रीका में भी जैन धर्म के अनुयायी मिलते हैं। जैन अनुश्रुति मथुरा में विभिन्न कालों में अनेक जैन मूर्तियाँ मिली हैं, जो जैन संग्रहालय मथुरा में संग्रहीत हैं। अवैदिक धर्मों में जैन धर्म सबसे प्राचीन है, प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव माने जाते हैं। जैन धर्म के अनुसार भी ऋषभदेव का मथुरा से संबंध था। जैन धर्म की प्रचलित अनुश्रुति के अनुसार नाभिराय के पुत्र भगवान ऋषभदेव के आदेश से इन्द्र ने 52 देशों की रचना की थी। शूरसेन देश और उसकी राजधानी मथुरा भी उन देशों में थी। जैन `हरिवंश पुराण' में प्राचीन भारत के जिन 18 महाराज्यों का उल्लेख हुआ है, उनमें शूरसेन और उसकी राजधानी मथुरा का नाम भी है। जैन मान्यता के अनुसार प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के सौ पुत्र हुए थे। तीर्थंकर जैन धर्म में 24 तीर्थंकर माने गए हैं, जिन्हें इस धर्म में भगवान के समान माना जाता है। 'तीर्थंकर' शब्द का जैन धर्म में बड़ा ही महत्त्व है। 'तीर्थ' का अर्थ है- "जिसके द्वारा संसार समुद्र तरा जाए, पार किया जाए।" जैन धर्म अहिंसा प्रधान धर्म है। इसमें उन 'जिनों' एवं महात्माओं को तीर्थंकर कहा गया है, जिन्होंने प्रवर्तन किया, उपदेश दिया और असंख्य जीवों को इस संसार से 'तार' दिया। इन 24 तीर्थंकरों ने अपने-अपने समय में धर्ममार्ग से च्युत हो रहे जन-समुदाय को संबोधित किया और उसे धर्ममार्ग में लगाया। इसी से इन्हें धर्ममार्ग और मोक्षमार्ग का नेता तीर्थ प्रवर्त्तक 'तीर्थंकर' कहा गया है। जैन सिद्धान्त के अनुसार 'तीर्थंकर' नाम की एक पुण्य कर्म प्रकृति है। उसके उदय से तीर्थंकर होते और वे तत्त्वोपदेश करते हैं। आचार्य विद्यानंद ने स्पष्ट कहा है- "बिना तीर्थंकरत्वेन नाम्ना नार्थोपदेशना" अर्थात बिना तीर्थंकर-पुण्यनामकर्म के तत्त्वोपदेश संभव नहीं है। ऋषभदेव जैन तीर्थंकरों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव हैं। जैन साहित्य में इन्हें प्रजापति, आदिब्रह्मा, आदिनाथ, बृहद्देव, पुरुदेव, नाभिसूनु और वृषभ नामों से भी समुल्लेखित किया गया है। युगारंभ में इन्होंने प्रजा को आजीविका के लिए कृषि, मसि, असि[10], शिल्प, वाणिज्य और सेवा- इन षट्कर्मों (जीवनवृतियों) के करने की शिक्षा दी थी, इसलिए इन्हें ‘प्रजापति’, माता के गर्भ से आने पर हिरण्य (सुवर्ण रत्नों) की वर्षा होने से ‘हिरण्यगर्भ’, विमलसूरि-, दाहिने पैर के तलुए में बैल का चिह्न होने से ‘ॠषभ’, धर्म का प्रवर्तन करने से ‘वृषभ’, शरीर की अधिक ऊँचाई होने से ‘बृहद्देव’ एवं पुरुदेव, सबसे पहले होने से ‘आदिनाथ’ और सबसे पहले मोक्षमार्ग का उपदेश करने से ‘आदिब्रह्मा’ कहा गया है। ऋषभदेव के पिता का नाम नाभिराय होने से इन्हें ‘नाभिसूनु’ भी कहा गया है। इनकी माता का नाम मरुदेवी था। ऋषभदेव भगवान का जन्म कोड़ा कोड़ी वर्ष पूर्व अयोध्या नगरी में चैत्र कृष्ण नवमी के दिन माता मरुदेवी के गर्भ से हुआ था। पुनः लाखों वर्षों तक राज्य सत्ता संचालन करने के बाद चैत्र कृष्णा नवमी के दिन ही उन्होंने जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर ली थी, ऐसा जैन शास्त्रों में कथन मिलता है। उनकी स्मृति में प्रतिवर्ष दिगंबर जैन समाज की ओर से जन्मदिन का मेला आयोजित किया जाता है। अयोध्या दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी के वर्तमान अध्यक्ष स्वस्ति श्री कर्मयोगी पीठाधीश रवीन्द्रकीर्ति स्वामी जी - जम्बूद्वीप, हस्तिनापुर वाले हैं।उनके नेतृत्व में पूरे देश की जैनसमाज के श्रद्धालु भक्त मेले में भाग लेने हेतु अयोध्या पहुँचते हैं। वहाँ भगवान ऋषभदेव का मस्तकाभिषेक - रथयात्रा - सभा आदि का आयोजन होता है। इस वर्ष यह वार्षिक मेला 4 अप्रैल - 2013 चैत्र कृष्णा नवमी को आयोजित हो रहा है। महावीर वर्धमान महावीर या महावीर, जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान श्री ऋषभनाथ की परम्परा में 24वें तीर्थंकर थे। इनका जीवन काल 599 ईसवी, ईसा पूर्व से 527 ईस्वी ईसा पूर्व तक माना जाता है। वर्धमान महावीर का जन्म एक क्षत्रिय राजकुमार के रूप में एक राजपरिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम राजा सिद्धार्थ एवं माता का नाम प्रियकारिणी था। उनका जन्म प्राचीन भारत के वैशाली राज्य, जो अब बिहार प्रान्त में हुआ था। वर्धमान महावीर का जन्म दिन समस्त भारत में महावीर जयन्ती के रूप में मनाया जाता है। दिगम्बर जैन आगम ग्रंथों के अनुसार भगवान महावीर बिहार प्रांत के कुंडलपुर नगर में आज (सन 2013) से 2612 वर्ष पूर्व महाराजा सिद्धार्थ की महारानी त्रिशला के गर्भ से चैत्र कृष्ण त्रयोदशी को जन्मे थे। वह कुंडलपुर वर्तमान में नालंदा ज़िले में अवस्थित है। तीर्थंकर उपदेश जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों ने अपने-अपने समय में धर्म मार्ग से च्युत हो रहे जनसमुदाय को संबोधित किया और उसे धर्म मार्ग में लगाया। इसी से इन्हें 'धर्म मार्ग-मोक्ष मार्ग का नेता' और 'तीर्थ प्रवर्त्तक' अर्थात 'तीर्थंकर' कहा गया है। जैन सिद्धान्त के अनुसार 'तीर्थंकर' नाम की एक पुण्य, प्रशस्त कर्म प्रकृति है। उसके उदय से तीर्थंकर होते और वे तत्त्वोपदेश करते हैं। आचार्य विद्यानंद ने स्पष्ट कहा है कि 'बिना तीर्थंकरत्वेन नाम्ना नार्थोपदेशना' अर्थात बिना तीर्थंकर-पुण्यनामकर्म के तत्त्वोपदेश संभव नहीं है। इन तीर्थंकरों का वह उपदेश जिन शासन, जिनागम, जिनश्रुत, द्वादशांग, जिन प्रवचन आदि नामों से उल्लिखित किया गया है। उनके इस उपदेश को उनके प्रमुख एवं प्रतिभाशाली शिष्य विषयवार भिन्न-भिन्न प्रकरणों में निबद्ध या ग्रथित करते हैं। अतएव उसे 'प्रबंध' एवं 'ग्रन्थ' भी कहते हैं। उनके उपदेश को निबद्ध करने वाले वे प्रमुख शिष्य जैनवाङमय में गणधर कहे जाते हैं। ये गणधर अत्यन्त सूक्ष्मबुद्धि के धारक एवं विशिष्ट क्षयोपशम वाले होते हैं। उनकी धारणाशक्ति और स्मरणशक्ति असाधारण होती है। जैन धर्म के प्रमुख सिद्धांत जैन धर्म के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं:- निवृत्तिमार्ग ईश्वर सृष्टि कर्म त्रिरत्न ज्ञान स्यादवाद या अनेकांतवाद या सप्तभंगी का सिद्धान्त अनेकात्मवाद निर्वाण कायाक्लेश नग्नता पंचमहाव्रत पंच अणुव्रत अठारह पाप जैन धर्म की प्रासंगिकता जैन ग्रंथ भगवान महावीर एवं जैन दर्शन में जैन धर्म एवं दर्शन की युगीन प्रासंगिकता को व्याख्यायित करते हुए यह मत व्यक्त किया है कि आज के मनुष्य को वही धर्म-दर्शन प्रेरणा दे सकता है तथा मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, राजनीतिक समस्याओं के समाधान में प्रेरक हो सकता है जो वैज्ञानिक अवधारणाओं का परिपूरक हो, लोकतंत्र के आधारभूत जीवन मूल्यों का पोषक हो, सर्वधर्म समभाव की स्थापना में सहायक हो, अन्योन्याश्रित विश्व व्यवस्था एवं सार्वभौमिकता की दृष्टि का प्रदाता हो तथा विश्व शान्ति एवं अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना का प्रेरक हो। लेखक ने इन प्रतिमानों के आधार पर जैन धर्म एवं दर्शन की मीमांसा की है। Q.4 बुद्ध विहार का इस्तेमाल किया जाता था: 1) शैक्षणिक के लिए 2) बुद्ध भिक्षू के लिए 3) बुद्ध के भक्तों के निवास के लिए 4) धार्मिक विस्तार Codes: A) 1,3,4 B) 2,3,4 C) 1,2,4 D) 1,2,3,4 उत्तर। सी Q.5 कथक नृत्य के संदर्भ में निम्नलिखित बयानों मेँ से कौन सा सही है ? 1) शरीर का वजन समान रूप से क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर अक्ष पर वितरित होता है 2) पूर्ण पैर के संपर्क का प्रमुख महत्व है जिसमेँ पैर की अंगुली या पैर के गिट्टे का उपयोग किया जाता है 3) शरीर का तीव्र झुकाव और ऊपरी या निचले हिस्से का झुकन प्रतिबंधित होता है 4) इसमेँ धड़-भ्रमण होते हैँ जो कंधे लाइन के बदलने के दवारा उभरते हैँ 5) इस नृत्य मेँ नर्तक सीधे खड़ा होता है और सिर की तुलना में एक हाथ उच्च स्तर पर रखता है और अन्य कंधे के स्तर के बाहर बढ़ाता है Codes: A) 1,3,4,5 B) 2,3,4,5 C) 1,2,3,4 D) All are correct उत्तर। डी Q.6 हिंदुस्तानी क्लासिक संगीत के सँदर्भ मेँ निम्नलिखित मेँ से क्या सही है ? 1) अनिबद्ध संगीत सार्थक शब्दों और ताल के द्वारा प्रतिबंधित होता है 2) प्रबंधा अक्सर संगीत रचना इंगित करने के लिए एक सामान्य शब्द के रूप में प्रयोग किया जाता है Codes: A) Only 1 B) Only 2 C) Both are correct D) Both are incorrect उत्तर। बी Q.7 ध्रुपद के संदर्भ मेँ निम्नलिखित बयानों मेँ से कौन सा बयान सही है ? 1) संरचनात्मक ध्रुपद के दो भाग होते हैँ , अनिब्द्धा अनुभाग और उचित संचारी ध्रुपद 2) ध्रुपद दृष्टिकोण की आवश्यक गुणवत्ता निराशाजनक माहौल और लय पर जोर देना होता है 3) डागरवानी, खन्डर वाणी एवं नौहर वाणी ध्रुपद गायन के स्कूल हैं Codes : A) 1 & 3 B) 2 & 3 C) 1 & 2 D) 1,2,3 उत्तर। डी आज तक सर्व सम्मति से यह निश्चित नहीं हो पाया है कि ध्रुपद का अविष्कार कब और किसने किया। इस सम्बन्ध में विद्वानों के कई मत हैं। अधिकांश विद्वानों का मत यह है कि पन्द्रहवीं शताब्दी में ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर ने इसकी रचना की। इतना तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि राजा मानसिंह तोमर ने ध्रुपद के प्रचार में बहुत हाथ बंटाया । अकबर के समय में तानसेन और उनके गुरु स्वामी हरिदास डागर, नायक बैजू और गोपाल आदि प्रख्यात गायक ही गाते थे । ध्रुपद गंभीर प्रकृति का गीत है। इसे गाने में कण्ठ और फेफड़े पर बल पड़ता है । इसलिये लोग इसे मर्दाना गीत कहते हैं । नाट्यशास्र के अनुसार वर्ण, अलंकार, गान- क्रिया, यति, वाणी, लय आदि जहाँ ध्रुव रूप में परस्पर संबद्ध रहें, उन गीतों को ध्रुवा कहा गया है । जिन पदों में उक्त नियम का निर्वाह हो रहा हो, उन्हें ध्रुवपद अथवा ध्रुपद कहा जाता है । शास्रीय संगीत के पद, ख़याल, ध्रुपद आदि का जन्म ब्रजभूमि में होने के कारण इन सबकी भाषा ब्रज है और ध्रुपद का विषय समग्र रूप ब्रज का रास ही है । कालांतर में मुग़लकाल में ख़्याल उर्दू की शब्दावली का प्रभाव भी ध्रुपद रचनाओँ पर पड़ा । वृन्दावन के निधिवन निकुंज निवासी स्वामी हरिदास ने इनके वर्गीकरण और शास्त्रीयकरण का सबसे पहले प्रयास किया । स्वामी हरिदास की रचनाओं में गायन, वादन और नृत्य संबंधी अनेक पारिभाषिक शब्द, वाद्ययंत्रों के बोल एवं नाम तथा नृत्य की तालों व मुद्राओं के स्पष्ट संकेत प्राप्त होते हैं । सूरदास द्वारा रचित ध्रुवपद अपूर्व नाद- सौंदर्य, गमक एवं विलक्षण शब्द- योजना से ओतप्रोत दिखाई देते हैं । हिंदुस्तानी संगीत में चार भागों में बंटा पुरातन स्वर संगीत, जिसमें सबसे पहले विस्तृत परिचयात्मक आलाप किया जाता है और फिर उस लय, ताल और धुन की बढ़त से फैलाया जाता है। यह बाद में प्रचलित छोटे ख़याल से संबंधित है, जिसके कुछ हद तक ध्रुपद की लोकप्रियता को कम कर दिया है, शास्त्रीय ध्रुपद की गुरु गंभीर राजसी शैली के लिए अत्यधिक श्वास नियंत्रण की आवश्यकता होती थी। इसका गायन नायकों, ईश्वरों और राजाओं की प्रशंसा में किया जाता था। Q.8 खयाल के संदर्भ मेँ निम्नलिखित बयानों मेँ से कौन सा बयान सही है ? 1) यह हमेशा मध्यम गति में होता है 2) शब्दोँ का स्पष्ट रूप से और एक खुले और स्पष्ट आवाज में उच्चारण किया जाता है 3) विलक्षित पात्र मुख्य रूप से गद्याँश होते हैँ जो अलंकार पर आधारित होते हँ Codes: A) 1 & 3 B) 2 & 3 C) 1 & 2 D) 1,2,3 उत्तर। डी Q.9 ठुमरी और ठ्प्पा के संदर्भ में निम्नलिखित बयानों मेँ से क्या सही है ? 1) ठुमरी एक प्रेम गीत है जो संरचना में काव्यात्मक है 2) टप्पा तेज नोट पैटर्न में बोला जाता है Codes: A) Only 1 B) Only 2 C) Both are correct D) Both are incorrect उत्तर। सी Q.10 निम्नलिखित बयानों मेँ से क्या गित्तम के सँदर्भ मेँ सही है जो एक सँगीत का प्रकार है ? 1) यह शुरू से अंत तक दोहराव के साथ गाया जाता है 2) इस प्रकार का सँगीत राग का एक सरल मधुर विस्तार होता है जिसमेँ सँरँचित हुआ है 3) टेंपो सम्मान होता है Codes: A) 1 & 3 B) 2 & 3 C) 1 & 2 D) 1,2,3 उत्तर। बी

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