Q.1 निम्नलिखित में से किसने थियोसोफिकल सोसायटी को स्थापित किया है ? A) मैडम ब्लावत्स्की और एनी बेसेंट B) ए.ओ. ह्यूम और एनी बेसेंट C) एच.एस. एल्कौट और एनी बेसेंट D) मैडम ब्लावत्स्की और एच.एस. एल्कौट Ans. D Q.2 निम्न में से क्या सहायक गठबंधन की सुविधा है? 1) भारतीय राज्य को ब्रिटिश निवासी को राजधानी में रखना होता था 2) एक सहायक ब्रिटिश सेना भारतीय राज्य में बनाए रखा जाना था 3) भारतीय सैनिक कंपनी कमांडरों द्वारा इस्तेमाल किया जा सकते थे 4) सहायक ब्रिटिश सेना पर किए गए खर्च का निर्धारण भारतीय राज्य का कर्तव्य था Codes: A) 1,3,4 B) 2,3,4 C) 1,2,4 D) 1,2,3,4 Ans. C Q.3 बयान: 1) वर्नाकुलर प्रेस एक्ट 1882 में लार्ड रिपन द्वारा निरस्त कर दिया गया था 2) इस अधिनियम ने अंग्रेजी प्रेस और स्थानीय भाषा प्रेस के बीच भेदभाव नहीं किया Codes: A) Only 1 B) Only 2 C) Both are correct D) Both are incorrect Ans. C वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट वाइसराय लिटन द्वारा 1878 ई. में पास हुआ था। इस एक्ट ने भारतीय भाषाओं में प्रकाशित होने वाले सभी समाचार पत्रों पर नियंत्रण लगा दिया। किंतु यह एक्ट अंग्रेज़ी में प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों पर लागू नहीं किया गया। इसके फलस्वरूप भारतीयों ने इस एक्ट का बड़े ज़ोर से विरोध किया।  'वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट' तत्कालीन लोकप्रिय एवं महत्त्वपूर्ण राष्ट्रवादी समाचार पत्र 'सोम प्रकाश' को लक्ष्य बनाकर लाया गया था।  दूसरे शब्दों में यह अधिनियम मात्र 'सोम प्रकाश' पर लागू हो सका।  लिटन के वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट से बचने के लिए 'अमृत बाज़ार पत्रिका' (समाचार पत्र), जो बंगला भाषा की थी, अंग्रेज़ी साप्ताहिक में परिवर्तित हो गयी।  सोम प्रकाश, भारत मिहिर, ढाका प्रकाश और सहचर आदि समाचार पत्रों के ख़िलाफ़ भी मुकदमें चलाये गये।  इस अधिनियम के तहत समाचार पत्रों को न्यायलय में अपील करने का कोई अधिकार नहीं था।  वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट को 'मुंह बन्द करने वाला अधिनियम' भी कहा गया है।  इस घृणित अधिनियम को लॉर्ड रिपन ने 1882 ई. में रद्द कर दिया। Q.4 बयान: 1) गिर्नी कामगार यूनियन उन श्रमिकों की बर्खास्तगी के लिए था जिन्होंने एक आम हड़ताल 1928 हमलों में भाग लिया था 2) सती के खिलाफ केशव चंद्रा के अभियान के द्वारा गवर्नर जनरल ने सती प्रतिबंध लगाने के लिए एक कानून को लागू किया Codes: A) Only 1 B) Only 2 C) Both are correct D) Both are incorrect Ans. C Q.5 निम्नलिखित में से कौन उदारवादी एवं सामान्य थे ? 1) विपिन चन्द्र पाल 2) गोपाल कृष्ण गोखले 3) सुरेंद्रनाथ बनर्जी 4) फिरोज शाह मेहता Codes: A) 1,3,4 B) 2,3,4 C) 1,2,3 D) 1,2,3,4 Ans. B Q.6 निम्नलिखित में से कौन लड़ाकु राष्ट्रवादी (militant nationalists) थे? 1) लाला लाजपत राय 2) बिपिन चंद्र पाल 3) बाल गंगाधर तिलक 4) गोपाल कृष्ण गोखले Codes: A) 1,3,4 B) 2,3,4 C) 1,2,3 D) 1,2,3,4 Ans. C Q.7 बयान: 1) कांग्रेस का 1907 में अपनी सूरत सत्र में दो भागों में विभाजन किया गया था 2) बाल गंगाधर तिलक ने देश के युवाओं में एक नई भावना जगाने के लिए महाराष्ट्र में गणपति और शिवाजी के त्योहारों को पुनर्जीवित किया 3) औरोबिन्दो घोष अलीपुर बम मामले के सिलसिले में गिरफ्तार किए गये थे Codes: A) 1 & 3 B) 2 & 3 C) 1 & 2 D) 1,2,3 Ans. D Q.8 निम्न में से कौन से प्रस्ताव थे जो 1907 में सूरत में कांग्रेस में विभाजन का कारण बना ? 1) स्वदेशी 2) बायकाट 3) बंगाल के विभाजन का विलोपन 4) राष्ट्रीय शिक्षा Codes: A) 1,3,4 B) 2,3,4 C) 1,2,3 D) 1,2,3,4 Ans. C Q.9 निम्नलिखित में से कौन स्वराज पार्टी के सदस्य थे? 1) गोपाल कृष्ण गोखले 2) सरदार पटेल 3) मोतीलाल नेहरू Codes: A) 1 & 3 B) Only 3 C) 1 & 2 D) 1,2,3 Ans. B Q.10 बयान: 1) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने साइमन कमीशन का विरोध किया और इसके साथ सहयोग नहीं किया. 2) साइमन कमीशन में कोई भारतीय प्रतिनिधि नही थे Codes: A) Only 1 B) Only 2 C) Both are correct D) Both are incorrect Ans. C Q.11 निम्न में से क्या पूना पैक्ट के बारे में सही है? 1) संयुक्त मतदाताओं प्रणाली की स्वीकृति 2) केन्द्रीय विधानमंडल में दलित वर्ग के लिए सीटों का आरक्षण 3) प्रांतीय विधायिका में दलित वर्ग के लिए सीटों का आरक्षण 4) सरकारी नौकरियों में निचले वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व Codes: A) 1,3,4 B) 2,3,4 C) 1,2,3 D) 1,2,3,4 Ans. C

हिंदू समाज में जिन जातियों या वर्गों के साथ अस्पृश्यता का व्यवहार किया जाता था, और आज भी कुछ हद तक वैसा ही विषम व्यवहार कहीं कहीं पर सुनने और देखने में आता है, उनको अस्पृश्य, अंत्यज या दलित नाम से पुकारते थे। यह देखकर कि ये सारे ही नाम अपमानजनक हैं, सन् 1932 के अंत में गुजरात के एक अंत्यज ने ही महात्मा गांधी को एक गुजराती भजन का हवाला देकर लिखा कि अंत्यजों को "हरिजन" जैसा सुंदर नाम क्यों न दिया जाए। उस भजन में हरिजन ऐसे व्यक्ति को कहा गया है, जिसका सहायक संसार में, सिवाय एक हरि के, कोई दूसरा नहीं है। गांधी जी ने यह नाम पसंद कर लिया और यह प्रचलित हो गया। परिचय वैदिक काल में अस्पृश्यता का कोई उल्लेख नहीं पाया जाता। परंतु वर्णव्यवस्था के विकृत हो जाने और जाति पाँति की भेद भावना बढ़ जाने के कारण अस्पृश्यता को जन्म मिला। इसके ऐतिहासिक, राजनीतिक आदि और भी कई कारण बतलाए जाते हैं। किंतु साथ ही साथ, इसे एक सामाजिक बुराई भी बतलाया गया। "वज्रसूचिक" उपनिषद् में तथा महाभारत के कुछ स्थलों में जातिभेद पर आधारित ऊँचनीचपन की निंदा की गई है। कई ऋषि मुनियों ने, बुद्ध एवं महावीर ने कितने ही साधु संतों ने तथा राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती प्रभृति समाजसुधारकें ने इस सामाजिक बुराई की ओर हिंदू समाज का ध्यान खीचा। समय समय पर इसे मिटाने के जहाँ तहाँ छिट पुट प्रयत्न भी किए गए, किंतु सबसे जोरदार प्रयत्न तो गाँधी जी ने किया। उन्होंने इसे हिंदूधर्म के माथे पर लगा हुआ कलंक माना और कहा कि "यदि अस्पृश्यता रहेगी, तो हिंदू धर्म का - उनकी दृष्टि में "मानव धर्म" का - नाश निश्चित है।" स्वातंत्र्य प्राप्ति के लिए गाँधी जी ने जो चतु:सूत्री रचनात्मक कार्यक्रम देश के सामने रखा, उसमें अस्पृश्यता का निवारण भी था। परंतु इस आंदोलन ने देशव्यापी रूप तो 1932 के सितंबर मास में धारण किया, जिसका संक्षिप्त इतिहास यह है- लंदन में आयोजित ऐतिहासिक गोलमेज़ परिषद् के दूसरे दौर में, कई मित्रों के अनुरोध पर, गांधी जी सम्मिलित हुए थे। परिषद् ने भारत के अल्पसंख्यकों के जटिल प्रश्न को लेकर जब एक कमेटी नियुक्त की, तो उसके समक्ष 12 नवंबर, 1931 को गांधी जी ने अछूतों की ओर से बोलते हुए कहा - "मेरा दावा है कि अछूतों के प्रश्न का सच्चा प्रतिनिधित्व तो मैं कर सकता हूँ। यदि अछूतों के लिए पृथक् निर्वाचन मान लिया गया, तो उसके विरोध में मैं अपने प्राणों की बाजी लगा दूँगा।" गांधी जी को विश्वास था कि पृथक् निर्वाचन मान लेने से हिंदू समाज के दो टुकड़े हो जाएँगे, और उसका यह अंगभंग लोकतंत्र तथा राष्ट्रीय एकता के लिए बड़ा घातक सिद्ध होगा, और अस्पृश्यता को मानकर सवर्ण हिंदुओं ने जो पाप किया है उसका प्रायश्चित्त करने का अवसर उनके हाथ से चला जाएगा। गोलमेज परिषद् से गांधी के आते ही स्वातंत्र्य आंदोलन ने फिर से जोर पकड़ा। गांधी जी को तथा कांग्रेस के कई प्रमुख नेताओं को जेलों में बंद कर दिया गया। गांधी जी ने यरवदा जेल से भारत मंत्री श्री सेम्युएल होर के साथ इस बारे में पत्रव्यवहार किया। प्रधान मंत्री को भी लिखा। किंतु जिस बात की आशंका थी वही होकर रही। ब्रिटिश मंत्री रैमजे मैकडानल्ड ने अपना जो सांप्रदायिक निर्णय दिया, उसमें उन्होंने दलित वर्गों के लिए पृथक् निर्वाचन को ही मान्यता दी। 13 सितंबर, 1932 को गांधी जी ने उक्त निर्णय के विरोध में आमरण अनशन का निश्चय घोषित कर दिया। सारा भारत काँप उठा इस भूकंप के जैसे धक्के से। सामने विकट प्रश्न खड़ा था कि अब क्या होगा। देश के बड़े बड़े नेता इस गुत्थी को सुलझाने के लिए इकट्ठा हुए। मदनमोहन मालवीय, च. राजगोपालचारी, तेजबहादुर सप्रू, एम. आर. जयकर, अमृतलाल वि. ठक्कर, घनश्याम बिड़ला आदि, तथा दलित वर्गों के नेता डाक्टर अंबेडकर, श्रीनिवासन्, एम. सी. राजा और दूसरे प्रतिनिधि। तीन दिन तक खूब विचारविमर्श हुआ। चर्चा में कई उतार चढ़ाव आए। अंत में 24 सिंतबर को सबने एकमत से एक निर्णीत समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए, जो "पूना पैक्ट" के नाम से प्रसिद्ध हुआ। पूना पैक्ट ने दलित वर्गों के लिए ब्रिटिश भारत के अंतर्गत मद्रस, बंबई (सिंध के सहित) पंजाब, बिहार और उड़ीसा, मध्यप्रांत, आसाम, बंगाल और संयुक्त प्रांत की विधान सभाओं में कुल मिलाकर 148 स्थान, संयुक्त निर्वाचन प्रणाली मानकर, सुरक्षित कर दिए, जबकि प्रधानमंत्री के निर्णय में केवल 71 स्थान दिए गए थे, तथा केंद्रीय विधान सभा में 18 प्रतिशत स्थान उक्त पैक्ट में सुरक्षित कर दिए गए। पैक्ट की अवधि 10 वर्ष की रखी गई, यह मानकर कि 10 वर्ष के भीतर अस्पृश्यता से पैदा हुई निर्योग्यताएँ दूर कर दी जाएँगी। सर तेजबहादुर सप् डिग्री और श्रीजयकर ने इस पैक्ट का मसौदा तत्काल तार द्वारा ब्रिटिश प्रधान मंत्री को भेज दिया। फलत: प्रधान मंत्री ने जो सांप्रदायिक निर्णय दिया था, उसमें से दलित वर्गों के पृथक् निर्वाचन का भाग निकाल दिया। समस्त भारत के हिंदुओं के प्रतिनिधियों की जो परिषद् 25 सिंतबर, 1932 को बंबई में पं. मदनमोहन मालवीय के सभापतित्व में हुई, उसमें एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसका मुख्य अंश यह है - आज से हिंदुओं में कोई भी व्यक्ति अपने जन्म के कारण "अछूत" नहीं माना जाएगा, और जो लोग अब तक अछूत माने जाते रहे हैं, वे सार्वजनिक कुओं, सड़कों और दूसरी सब संस्थाओं का उपयोग उसी प्रकार का कर सकेंगे, जिस प्रकार कि दूसरे हिंदू करते हैं। अवसर मिलते ही, सबसे पहले इस अधिकार के बारे में कानून बना दिया जाएगा, और यदि स्वतंत्रता प्राप्त होने से पहले ऐसा कानून न बनाया गया तो स्वराज्य संसद् पहला कानून इसी के बारे में बनाएगी। 26 सितंबर को गांधी जी ने, कवि रवींद्रनाथ ठाकुर तथा अन्य मित्रों की उपस्थिति में संतरे का रस लेकर अनशन समाप्त कर दिया। इस अवसर पर भावविह्वल कवि ठाकुर ने स्वरचित "जीवन जखन शुकाये जाय, करुणा धाराय एशो" यह गीत गाया। गांधी जी ने अनशन समाप्त करते हुए जो वक्तव्य प्रकाशनार्थ दिया, उसमें उन्होंने यह आशा प्रकट की कि, "अब मेरी ही नहीं, किंतु सैकड़ों हजारों समाजसंशोधकों की यह जिम्मेदारी बहुत अधिक बढ़ गई है कि जब तक अस्पृश्यता का उन्मूलन नहीं हो जाता, इस कलंक से हिंदू धर्म को मुक्त नहीं क लिया जाता, तब तक कोई चैन से बैठ नहीं सकता। यह न मान लिया जाए कि संकट टल गया। सच्ची कसौटी के दिन तो अब आनेवाले हैं।" इसके अनंतर 30 सितंबर को पुन: बंबई में पंडित मालवीय जी की अध्यक्षता में जो सार्वजनिक सभा हुई, उसमें सारे देश के हिंदु नेताओं ने निश्चय किया कि अस्पृश्यतानिवारण के उद्देश्य से एक अखिल भारतीय अस्पृश्यताविरोधी मंडल (ऐंटी-अन्टचेबिलिटी लीग) स्थापित किया जाए, जिसका प्रधान कार्यालय दिल्ली में रखा जाए, और उसकी शाखाएँ विभिन्न प्रांतों में और उक्त उद्देश्य को पूरा करने के लिए यह कार्यक्रम हाथ में लिया जाए - (क) सभी सार्वजनिक कुएँ, धर्मशालाएँ, सड़कें, स्कूल, श्मशानघाट, इत्यादि दलित वर्गों के लिए खुले घोषित कर दिए जाएँ, (ख) सार्वजनिक मंदिर उनके लिए खोल दिए जाएँ, (ग) बशर्ते कि (क) और (ख) के संबंध में जोर जबरदस्ती का प्रयोग न किया जाए, बल्कि केवल शांतिपूर्वक समझानेबुझाने का सहारा लिया जाए।"" इन निश्चयों के अनुसार "अस्पृश्यता-विरोधी-मंडल" नाम की अखिल भारतीय संस्था, बाद में जिसका नाम बदलकर "हरिजनसेवक-संघ" रखा गया, बनाई गई। संघ का मूल संविधान गांधी जी ने स्वयं तैयार किया। हरिजन-सेवक-संघ ने अपने संविधान में जो मूल उद्देश्य रखा वह यह है-"संघ का उद्देश्य हिंदूसमाज में सत्यमय एवं अहिंसक साधनों द्वारा छुआछूत को मिटाना और उससे पैदा हुई उन दूसरी बुराइयों तथा निर्योग्यताओं को जड़मूल से नष्ट करना है, जो तथाकथित अछूतों को, जिन्हें इसके बाद "हरिजन" कहा जाएगा, जीवन के सभी क्षेत्रों में भोगनी पड़ती हैं, और इस प्रकार उन्हें पूर्ण रूप से शेष हिंदुओं के समान स्तर पर ला देना है।" "अपने इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए हरिजन-सेवक-संघ भारत भर के सवर्ण हिंदुओं से संपर्क स्थापित करने का प्रयत्न करेगा, और उन्हें समझाएगा कि हिंदूसमाज में प्रचलित छूआछूत हिंदू धर्म के मूल सिद्धांतों और मानवता की उच्चतम भावनाओं के सर्वथा विरुद्ध है, तथा हरिजनों के नैतिक, सामाजिक और भौतिक कल्याणसाधक के लिए संघ उनकी भी सेवा करेगा।"" हरिजन-सेवक-संघ का प्रथम अध्यक्ष श्री घनश्यामदास बिड़ला को नियुक्त किया गया, और मंत्री का पद सँभाला श्रीअमृतलाल विट्ठलदास ठक्कर ने, जो "ठक्कर बापा" के नाम से प्रसिद्ध थे। श्रीठक्कर ने सारे प्रांतों के प्रमुख समाजसुधारकों एवं लोकवेताओं से मिलकर कुछ ही महीनों में संघ को पूर्णतया संगठित कर दिया। गांधी जी ने जेल के अंदर से ही हरिजन आंदोलन को व्यापक और सक्रिय बनाने की दृष्टि से तीन साप्ताहिक पत्रों का प्रकाशन कराया-अंग्रेजी में "हरिजन", हिंदी में "हरिजन सेवक" और गुजराती में "हरिजन बंधु"। इन साप्ताहिक पत्रों ने कुछ ही दिनों में "यंग इंडिया" और "नवजीवन" का स्थान ले लिया, जिनका प्रकाशन राजनीतिक कारणों से बंद हो गया था। हरिजन प्रश्न के अतिरिक्त अन्य सामयिक विषयों पर भी गांधी जी इन पत्रों में लेख और टिप्पणियाँ लिखा करते थे। कुछ दिनों बाद, ठक्कर बापा के अनुरोध पर अस्पृश्यतानिवारणार्थ गांधी जी ने सारे भारत का दौरा किया। लाखों लोगों ने गांधी जी के भाषणों को सुना, हजारों ने छुआछूत को छोड़ा और हरिजनों को गले लगाया। कहीं कहीं पर कुछ विरोधी प्रदर्शन भी हुए। किंतु विरोधियों के हृदय को गांधी जी ने प्रेम से जीत लिया। इस दौरे में हरिजनकार्य के लिए जो निधि इकट्ठी हुई, वह दस लाख रुपए से ऊपर ही थी। हरिजनों ने अपना जन्मजात अधिकार प्राप्त करने का साहस पैदा हुआ। सवर्णों का विरोध भी धीरे धीरे कम होने लगा। गांधी जी की यह बात लोगों के गले उतरने लगी कि "यदि अस्पृश्यता रहेगी तो हिंदू धर्म विनाश से बच नहीं सकता।" हरिजन-सेवक-संघ ने सारे भारत में हरिजन-छात्र-छात्राओं के लिए हजारों स्कूल और सैकड़ों छात्रालय चलाए। उद्योगशालाएँ भी स्थापित कीं। खासी अच्छी संख्या में विद्यार्थियों को छात्रवृत्तियाँ और अन्य सहायताएँ भी दीं। हरिजनों की बस्तियों में आवश्यकता को देखते हुए अनेक कुएँ बनवाए। होटलों, धर्मशालाओं तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों के उपयोग पर जो अनुचित रुकावटें थीं उनको हटवाया। बड़े बड़े प्रसिद्ध मंदिरों में विशेषत: दक्षिण भारत के मंदिरों में हरिजनों को सम्मानपूर्वक दर्शन पूजन के लिए प्रवेश दिलाया। देश स्वतंत्र होते ही संविधान परिषद् ने, डॉ. अंबेडकर की प्रमुखता में जो संविधान बनाया, अस्पृश्यता को "निषिद्ध" ठहरा दिया। कुछ समय के उपरांत भारतीय संसद् ने अस्पृश्यता अपराध कानून भी बना दिया। भारत सरकार ने अनुसूचित जातियों के लिए विशेष आयुक्त नियुक्त करके हरिजनों की शिक्षा तथा विविध कल्याण कार्यों की दिशा में कई उल्लेखनीय प्रयत्न किए। संसद् और राज्यों की विधान सभाओं में सुरक्षित स्थानों से जो हरिजन चुने गए, उनमें से अनेक सुयोग्य व्यक्तियों को केंद्र में एवं विभिन्न राज्यों में मंत्रियों के उत्तरदायित्वपूर्ण पद दिए गए। विभिन्न सरकारी विभागें में भी उनकी नियुक्तियाँ हुई। उनमें स्वाभिमान जाग्रत हुआ। आर्थिक स्थिति में भी यत्किंचित् सुधार हुआ। किंतु इन सबका यह अर्थ नहीं कि अस्पृश्यता का सर्वथा उन्मूलन हो गया है। स्पष्ट है कि समाजसंशोधन का आंदोलन केवल सरकार या किसी कानून पर पूर्णत: आधारित नहीं रह सकता। अस्पृश्यता का उन्मूलन प्रत्येक सवर्ण हिंदू का अपना कर्तव्य है, जिसके लिए उसका स्वयं प्रयत्न अपेक्षित है।
Q.12 कांग्रेस के मंत्रियों ने 1937 में चुनाव के बाद इस्तीफे की प्रस्तुति क्यों की ?

A)  प्रशासन चलाने के लिए अनुभवहीनता के कारण

B) सरकार द्वारा उनके कामकाज में अनुचित हस्तक्षेप करने के लिए

C) क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने परामर्श के बिना भारत में द्वितीय विश्व युद्ध के लिए एक पार्टी घोषणा की

डी) वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण जो सभी विकास कार्यों के आड़चन का कारण बनी

Ans. C

Q.13 बयान:

1) कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव को इनकार कर दिया

2) 1946 में गठित अंतरिम सरकार में केवल कांग्रेस के प्रत्याशी थे उनमें मुस्लिम लीग का कोई भी प्रत्याशी नही था

Codes:

A) Only 1

B) Only 2

C) Both are correct

D) Both are incorrect

Ans. A

Q.14 क्यों ब्रिटिश ने भारतीय अधिनियम 1935 के द्वारा फेडरल यूनियन में रियासतों को शामिल किया ?

A) रियासतों पर अधिक और प्रत्यक्ष राजनीतिक और प्रशासनिक नियंत्रण करने के लिए 

B) सक्रिय रूप से कॉलोनी के प्रशासन में रियासतों को शामिल करना

C) ब्रिटिश का सभी रियासतों पर अधिक राजनीतिक और प्रशासन प्रभावी करने के लिए

D) रियासतों का उपयोग करना राष्ट्रवादी नेताओं का विरोधी सम्राट सिद्धांत के लिए संतुलन करना

Ans. D

अधिनियम के सबसे महत्वपूर्ण पहलू थे:
•	ब्रिटिश भारत के प्रांतों के लिए बड़े पैमाने पर स्वायत्तता की अनुमति (भारत सरकार का 1919 अधिनियम द्वारा शुरूआत की गई द्विशासन की प्रणाली को समाप्त करना)
•	ब्रिटिश भारत और कुछ या सभी शाही राज्यों दोनों के लिए "भारतीय संघ" की स्थापना के लिए प्रावधान.
•	प्रत्यक्ष चुनाव की शुरूआत करना, ताकि सात लाख से पैंतीस लाख लोगों का मताधिकार बढ़े
•	प्रांतों का एक आंशिक पुनर्गठन:
•	सिंध, बंबई से अलग हो गया था
•	बिहार और उड़ीसा को अलग प्रांतों में विभाजित करते हुए बिहार और उड़ीसा किया गया था
•	बर्मा को सम्पूर्ण रूप से भारत से अलग किया गया था
•	एडन, भारत से अलग था, और अलग कॉलोनी के रूप में स्थापित हुआ.
•	प्रांतीय असेंबलियों की सदस्यता को बदल दिया गया और उसमें अधिक भारतीय प्रतिनिधि निर्वाचित हुए, जो कि अब एक बहुमत बना सकते थे और सरकारों बनाने के रूप में नियुक्त करना शामिल था.
•	एक संघीय न्यायालय की स्थापना
हालांकि, स्वायत्तता की डिग्री प्रांतीय स्तर की शुरूआत महत्वपूर्ण सीमाओं के अधीन था: प्रांतीय गवर्नर महत्वपूर्ण आरक्षित शक्तियों को बरकरार रखा, और ब्रिटिश अधिकारियों ने भी एक जिम्मेदार सरकार को निलंबित अधिकार बनाए रखा.
अधिनियम के कुछ हिस्सों की मांग भारत संघ को स्थापित करना था लेकिन राजसी राज्यों के शासकों के विरोध के कारण कभी संचालन में नहीं आया. जब अधिनियम के तहत पहला चुनाव का आयोजन हुआ तब अधिनियम का शेष भाग 1937 में लागू हुआ.

Q.15 बयान:

1) खुदाई खिदमतगार्स को रेड शर्ट्स के रूप में जाना जाता है जिन्हें उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष के लिए और पठान राष्ट्रवादी एकता के लिए बुलाया गया है

2) वैवल योजना के अनुसार कार्यकारी परिषद में हिंदू और मुस्लिम सदस्यों की  संख्या बराबर होनी चाहिए 

3) वैवल के अनुसार इस व्यवस्था से भारत का विभाजन नही होगा

Codes:

A) 1 & 3

B) 2 & 3

C) 1 & 2

D) 1,2,3

Ans. C

Q.16 बयान:

1) रोलेट एक्ट ने परीक्षण के बिना लोगों को कैद करने के लिए सरकार को अधिकृत किया था

2) इल्बर्ट बिल भारतीय और यूरोपिअन को एक साथ लाना चाहता था अदालतों के आपराधिक मामले में 

Codes:

A) Only 1

B) Only 2

C) Both are correct

D) Both are incorrect

Ans. C

जलियांवाला बाग अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के पास का एक छोटा सा बगीचा है जहाँ 13 अप्रैल 1919 को ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर के नेतृत्व में अंग्रेजी फौज ने गोलियां चला के निहत्थे, शांत बूढ़ों, महिलाओं और बच्चों सहित सैकड़ों लोगों को मार डाला था और हज़ारों लोगों को घायल कर दिया था। यदि किसी एक घटना ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर सबसे अधिक प्रभाव डाला था तो वह घटना यह जधन्य हत्याकाण्ड ही था। इल्बर्ट विधेयक (Ilbert Bill) भारत में सन् १८८३ में ब्रिटिश राज के दौरान वाइसराय रिपन द्वारा सुझाया गया एक कानून था जिसके अंतर्गत ज़िले-स्तर के भारतीय न्यायाधीशों को ब्रिटिश मुल्ज़िमों पर न्यायिक आदेश जारी करने का अधिकार दिया जाना था। उस समय से पहले भारतीयों को ब्रिटिश अपराधियों से सम्बंधित मुक़द्दमे सुनने का हक़ नहीं था। इस विधेयक का नाम कोर्टनी इल्बेर्ट (Courtenay Ilbert) पर रखा गया जो वाइसराय की भारत परिषद् के क़ानूनी सलाहकार थे। इस से पहले दो ऐसे विधेयकों पर चर्चा हुई थी और यह विधेयक उनका मिश्रित रूप था। इस विधेयक का उस समय भारत में मौजूद ब्रिटिश समुदाय ने ज़ोर-शोर से विरोध किया जिस से अंग्रेज़ों और भारतीयों में नसली तनाव बढ़ा। १८८४ में इसे तोड़मोड़ कर कमज़ोर किया गया और फिर यह पारित हुआ। इस विवाद से पैदा हुआ आपसी द्वेष का वातावरण अगले ही वर्ष (१८८५ में) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बन जाने का एक बड़ा कारण माना जाता है।
Q.17 बयान:

1) क्रिप्स प्रस्ताव में भारत की पूर्ण स्वतंत्रता का प्रावधान शामिल है

2) क्रिप्स प्रस्ताव में संविधान बनाने के निर्माण का प्रावधान भी शामिल है

Codes:

A) Only 1

B) Only 2

C) Both are correct

D) Both are incorrect

Ans. B

क्रिप्स प्रस्ताव 30 मार्च, 1942 ई. को प्रस्तुत किया गया था। 1942 ई. में जापान की फ़ौजों के रंगून (अब यांगून) पर क़ब्ज़ा कर लेने से भारत के सीमांत क्षेत्रों पर सीधा ख़तरा पैदा हो गया था। अब ब्रिटेन ने युद्ध में भारत का सक्रिय सहयोग पाने के लिए युद्धकालीन मंत्रिमण्डल के एक सदस्य स्टैफ़ोर्ड क्रिप्स को घोषणा के एक मसविदे के साथ भारत भेजा।
सिफ़ारिशें
23 मार्च, 1942 ई. को दिल्ली पहुँचकर विभिन्न नेताओं से सम्पर्क के पश्चात 30 मार्च, 1942 ई. को क्रिप्स ने अपनी योजना प्रस्तुत की, जिसकी सिफ़ारिशें इस प्रकार थीं-
1.	युद्ध के बाद एक ऐसे भारतीय संघ के निर्माण का प्रयत्न किया जाये, जिसे पूर्ण उपनिवेश का दर्जा प्राप्त हो। साथ ही साथ उसे राष्ट्रकुल से भी अलग होने का अधिकार प्राप्त होगा।
2.	युद्ध के बाद प्रान्तीय व्यवस्थापिकाओं के निचले सदनों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर एक संविधान निर्मात्री परिषद का गठन किया जायगा, जो देश के लिए संविधान का निर्माण करेगी। इस संविधान सभा में देशी रियासतों के भी प्रतिनिधि शामिल हो सकते हैं।
3.	संविधान सभा द्वारा निर्मित किये गये संविधान को सरकार दो शर्तों पर ही लागू कर सकेगी।
4.	नये भारतीय संविधान के निर्माण होने तक भारतीयों की रक्षा का उत्तरदायित्व ब्रिटिश सरकार पर होगा।
	जो प्रांत इससे सहमत नहीं हैं, वे इसे अस्वीकार कर पूर्ववत स्थिति में रह सकते हैं या फिर वे पूर्णतः स्वतन्त्र रहना चाहते हैं, तब भी ब्रिटिश सरकार को कोई आपत्ति नहीं होगी।
	भारतीय संविधान सभा तथा ब्रिटिश सरकार के मध्य अल्पसंख्यकों के हितों को लेकर एक समझौता होगा।
प्रस्ताव की तुलना
'अगस्त प्रस्ताव' की तुलना में क्रिप्स द्वारा लाया गया प्रस्ताव बेहतर था। इसमें भारत को ऐच्छिक रूप से राष्ट्रमण्डल से अलग होने का अधिकार मिला हुआ था। इस प्रकार क्रिप्स की इस योजना को लिनलिथगो के 'अगस्त प्रस्ताव' से अधिक प्रगतिशील कहा गया। गाँधी जी ने क्रिप्स योजना के बारे में कहा कि "यह एक आगे की तारीख का चेक था", जिसमें जवाहरलाल नेहरू ने "जिसका बैंक नष्ट होने वाला था", वाक्य जोड़ दिया।
भारतीय हितों की अवहेलना
क्रिप्स प्रस्तावों में भारत के विभाजन की रूपरेखा का संकेत मिल रहा था, अतः भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अंतरिम प्रबंध, रक्षा से सम्बधित योजना एवं प्रान्तों के आत्मनिर्णय के अधिकार को अस्वीकार कर दिया। दूसरी ओर पाकिस्तान की स्पष्ट घोषणा न किये जाने एवं संविधान सभा के गठन के कारण क्रिप्स प्रस्ताव को मुस्लिम लीग ने भी अस्वीकार कर दिया। पंजाब को भारत से अलग करने की योजना से सिक्खों में भी असन्तोष व्याप्त था। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि इस प्रस्ताव के पीछे ब्रिटिश सरकार का मूल उद्देश्य युद्ध के दौरान सभी भारतीय वर्गों एवं दलों की सहायता प्राप्त करना था। इस प्रस्ताव में भारतीय हितों की अनदेखी की गयी थी।






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