Q.1 गुप्त वंश के बारे में निम्नलिखित बयानों में से क्या सही है ? 1) कुमारमात्यास सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी थे और वे उन्हीं के प्रांतों में राजा से सीधे नियुक्त किए जाते थे 2) गांव के मुखिया ने महत्व खो दिया था और भूमि लेनदेन उनकी सहमति के बिना प्रभावित किए जाने लगा. Codes: A) Only 1 B) Only 2 C) Both are correct D) Both are incorrect Ans. D

सम्राट आदित्यसेन के अपसड़ (जिला गया) एवं सम्राट जीवित गुप्त के देववरणार्क (जिला शाहाबाद) के लेखों से एक अन्य गुप्त राजवंश का पता लगता है जो उपर्युक्त गुप्तवंश के पतन के पश्चात् मालवा और मगधमें शासक बना। इस वंश के संस्थापक कृष्णगुप्त थे। इनके क्रम में श्रीहर्षगुप्त, जीवितगुप्त, कुमारगुप्त, दामोदरगुप्त, महासेनगुप्त, माधवगुप्त, आदित्यसेन, विष्णुगुप्त एवं जीवितगुप्त (द्वितीय) इस वंश के शासक हुए। परिचय इस वंश का पूर्वकालिक गुप्तों से क्या संबंध था यह निश्चित नहीं है। पूर्वकालिक गुप्तों से पृथक् करने की दृष्टि से इन्हें माधवगुप्त या उत्तरकालीन गुप्त कहते हैं। इस नए गुप्तवंश का उत्पत्तिस्थल भी विवादग्रस्त है।हर्षचरित् में कुमारगुप्त और माधवगुप्त को ‘मालव राजपुत्र’ कहा है। महासेन गुप्त अनुमानत: मालवा के शासक थे भी। आदित्यसेन के पूर्ववर्ती किसी राजा का कोई लेख मगध प्रदेश से नहीं मिला। उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर कुछ विद्वानों ने कृष्णगुप्त के वंश का उत्पत्तिस्थल मालवा निश्चित किया। इसी आधार पर इन्हें मालवगुप्त कहते थे। किंतु अधिकांश विद्वान इन्हें मगध का ही मूल निवासी मानते हैं। इस वंश के आरंभिक नरेश संभवत: गुप्त सम्राटों के अधीनस्थ सामंत थे। अपसड़ अभिलेख में कृष्णगुप्त को नृप कहा है एवं समानार्थक संज्ञाएँ इस वंश के परवर्ती शासकों के लिये भी प्रयुक्त हुई हैं। अपने वंश की स्वतंत्र सत्ता सर्वप्रथम इस वंश के किस शासक ने स्थापित की, यह अज्ञात है। कृष्णगुप्त के लिये अपसड़ लेख में केवल इतना ही कहा गया है कि वे कुलीन थे। उनकी भुजाओं ने शत्रुओं के हाथियों का शिरोच्छेद सिंह की तरह किया तथा अपने असंख्य शत्रुओं पर विजयी हुए। कृष्णगुप्त के समय में ही संभवत: कन्नौज में हरिवर्मन् ने मौखरिवंश की स्थापना की। कृषणगुप्त ने संभवत: अपनी पुत्री हर्षगुप्ता का विवाह हरिवर्म के पुत्र आदित्यवर्मन् से किया। कृष्णगुप्त के पुत्र एवं उत्तराधिकारी श्रीहर्षगुप्त (लगभग 505-525 ई.) ने अनेक भयानक युद्धों में अपना शौर्य दिखाया और विजय प्राप्त की। इनके उत्तराधिकारी जीवितगुप्त (प्रथम) (ल. 525-545 ई.) को अपसड़ लेख में ‘क्षितीश-चूड़ामणि’ कहा गया है। उनके अतिमानवीय कार्यों को लोग विस्मय की दृष्टि से देखते थे। मागधगुप्तों के उत्तरकालीन सम्राटों के विषय में इस प्रकार की कोई बात ज्ञात नहीं होती। संभवत: राजनीतिक दृष्टि से आरंभिक माधवगुप्त अधिक महत्वपूर्ण भी नहीं थे, इसी से लेखों में उनकी पारंपरिक प्रशंसा ही की गई है। कुमारगुप्त (लगभग 540-560 ई.) के विषय में पर्याप्त एवं निश्चित जानकारी प्राप्त होती है। कदाचित उनके समय में मागधगुप्तों ने अपनी स्वतंत्र सत्ता की घोषण की होगी। कुमारगुप्त ने मौखरि नरेश ईशानवर्मन को पराजित किया। उनकी सफलता स्थायी थी। प्रयाग तक का प्रदेश उनके अधिकार में था। उन्होंने प्रयाग में प्राणोत्सर्ग किया। उनके पुत्र दामोदरगुप्त ने पुन: मौखरियों को युद्ध में पराजित किया, किंतु वे स्वयं युद्धक्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हुए। इसी काल में मागध पुत्री ने मालवा पर भी अपना अधिकार स्थापित किया। दामोदरगुप्त के उपरांत उनके पुत्र महासेनगुप्त (लं. 563 ई.) शासक हुए। मौखरियों के विरूद्ध, अपनी शक्ति दृढ़ करने के उद्देश्य से उन्होंने थानेश्वर के नरेश राज्यवर्धन के पुत्र आदित्यवर्धन से अपनी बहन महासेनगुप्ता का विवाह किया। हर्षचरित में उल्लिखित कुमारगुप्त एवं माधवगुप्त के पिता मालवराज संभवत: महासेनगुप्त ही थे। अपसड़ लेख के अनुसार इन्होंने लौहित्य (ब्रह्मपुत्र नदी) तक के प्रदेश पर आक्रमण किया, और असंभव नहीं कि उन्होंने मालवा से लेकर बंगाल तक के संपूर्ण प्रदेश पर कम से कम कुछ काल तक शासन किया हो। महासेनगुप्त ने मागध गुप्तों की स्थिति को दृढ़ किया, किंतु शीघ्र ही कलचुरिनरेश शंकरगण ने उज्जयिनी पर 595 ई. या इसके कुछ पहले अधिकार कर लिया। उधर वलभी के मैत्रक नरेश शीलादित्य (प्रथम) ने भी पश्चिमी मालव प्रदेश पर अधिकार स्थापित कर दिया। इसी बीच किसी समय संभवत: महासेनगुप्त के सामंत शासक शशांक ने अपने को उत्तर एवं पश्चिम बंगाल में स्वतंत्र घोषित कर दिया। संभवत: मगध भी महासेन गुप्त के अधिकार में इसी समय निकल गया। महासेनगुप्त का अपना अंत ऐसी स्थिति में क्योंकर हुआ, ज्ञात नहीं होता। पर उनके दोनों पुत्रों कुमारगुप्त और माधवगुप्त ने थानेश्वर में सम्राट प्रभाकरवर्धन के दरबार में शरण ली। इस अराजक स्थिति में किन्हीं देवगुप्त ने स्वयं को मालवा या उसके किसी प्रदेश का शासक घोषित कर दिया। इस देवगुप्त का कोई संबंध मागध गुप्तों के साथ था या नहीं, नहीं कहा जा सकता। हर्षवर्धन के अभिलेखों के अनुसार राज्यवर्धन ने देवगुप्त की बढ़ती हुई शक्ति को निरूद्ध किया था। हर्षचरित के अनुसार देवगुप्त ने गौड़ाधिप शशांक की सहायता से मौखरि राजा को पराजित कर उन्हें मार डाला तथा राज्यश्री को बंदी बना लिया। राज्यवर्धन ने देवगुप्त को पराजित किया। किंतु देवगुप्त आदि ने षड्यंत्र द्वारा उन्हें मार डाला। किंतु इसके बाद देवगुप्त भी पराजित हो गए और क्रमश: हर्षवर्धन ने प्राय: संपूर्ण उत्तर भारत में अपनी सत्ता स्थापित कर ली। अपसड़ लेख से प्रतीत होता है कि माधवगुप्त ने मगध पर शासन किया और प्राय: अपना सारा जीवन हर्ष के सामीप्य एवं मैत्री में व्यतीत किया। हर्ष ने भी संभवत: माधवगुप्त को पूर्वसंबंधी एवं मित्र होने के नाते मगध का प्रांतपति नियुक्त किया होगा। माधवगुप्त ने हर्ष की मृत्यु के बाद ही अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की होगी। अपसड़ लेख में माधवगुप्त को वीर, यशस्वी और अनेक शत्रुओं को पराजित करनेवाला कहा गया है। इनके राज्य का आरंभ हर्ष की मृत्यु के शीघ्र बाद एवं उसका अंत भी संभवत: शीघ्र ही हो गया होगा। माधवगुप्त के पश्चात् उनके पुत्र आदित्यसेन मगध के शासक हुए। इनके समय के अनेक लेख प्राप्त हुए हैं। उनकी सार्वभौम स्थिति की परिचायिका उनकी ‘महाराजाधिराज’ उपाधि है। देवघर से प्राप्त एक लेख में आदित्यसेन की चोल प्रदेश की विजय एवं उनके द्वारा किए गए विभिन्न यज्ञों आदि का उल्लेख है। उन्होंने तीन अश्वमेध भी किए। उनके काल के कुछ अन्य जनकल्याण संबंधी निर्माण कार्यों का ज्ञान लेखों से होता है। आदित्यसेन ने अपनी पुत्री का विवाह मौखरि नरेश भोगवर्मन से किया और उनकी पौत्री, भोगवर्मन की पुत्री, वत्सदेवी का विवाह नेपाल के राजा शिवदेव के साथ हुआ। नेपाल के कुछ लेखों में आदित्यसेन का उल्लेख ‘मगधाधिपस्य महत: श्री आदित्यसेनरय’ करके हुआ है। इससे लगता है कि पूर्वी भारत में मागधगुप्तों का बड़ा संमान एवं दबदबा था। आदित्यसेन के राज्य का अंत 672 ई. के बाद शीघ्र ही कभी हुआ। आदित्यसेन के उपरांत उनके पुत्र देवगुप्त (द्वितीय) मगध की गद्दी पर बैठे। 680 ई. के लगभग वातापी के चालुक्य राजा विनयादित्य ने संभत: देवगुप्त को पराजित किया। इन्होंने ‘महाराजाधिराज’ उपाधि धारण की। देववरणार्क लेख से स्पष्ट है कि देवगुप्त के पश्चात उनके पुत्र विष्णुगुप्त मगध के शासक हुए। महाराजाधिराज उपाधि इनके लिये भी प्रयुक्त है। इन्होंने कम से कम 17 वर्ष तक अवश्य राज्य किया क्योंकि इनके राज्य के 17वें वर्ष का उल्लेख इनके एक लेख में हुआ है। इस वंश के अंतिम नरेश जीवितगुप्त (द्वितीय) थे। गोमती नदी के किनारे इनके विजयस्कंधावार की स्थिति का उल्लेख मिलता है। इससे अनुमान होता है कि इन्होंने गोमती के तीरस्थ किसी प्रदेश पर मौखरियों के विरुद्ध आक्रमण किया था। जीवितगुप्त के पश्चात् इस वंश के किसी शासक का पता नहीं चलता। मागध गुप्तों का अंत भी अज्ञात है। गउडवहो से ज्ञात होता है कि 8वीं सदी के मध्य कन्नौज के शासक यशोवर्मन ने गौड़ के शासक को पराजित कर मार डाला। पराजित गौड़ाधिप को मगध का शासक भी कहा है इसलिये अनुमान है कि यशोवर्मन द्वारा पराजित राजा संभवत: जीवितगुप्त (द्वितीय) ही थे। असंभव नहीं कि गौड़ नरेश ने जीवितगुप्त को पराजितकर मगध उनसे छीन लिया हो और स्वयं गौड़ और मगध की स्थिति में यशोवर्मन के विरुद्ध युद्ध में मारा गया हो।
Q.2 1857 विद्रोह के संदर्भ में, जिन कारणों से सिपाही विद्रोह हुआ, वह कारण किया थे ?

1) ब्रिटिश भारतीय सेना में, यूरोपीय और भारतीय सैनिकों में असमानता 

2) जनरल सर्विस अंग्रेजों के कानून ने भारत के भीतर और बाहर बंगाल आर्मी को दोनों ही सेवा के लिए तैयार रहने का आदेश दिया 

Which of the above are correct?

A)Only 1

B)Only 2

C)Both are correct

D)Both are incorrect

Ans. B

Q.3 जजमानी प्रणाली के बारे में निम्नलिखित बयानों में से क्या सही नही है ? 

A) यह एक गैर बाजार विनिमय प्रणाली था

B) यह पूर्व औपनिवेशिक काल के दौरान कई गांवों व क्षेत्रों में अभ्यास किया जा रहा था

C) यह औपनिवेशिक शासन के दबाव में पेश किया गया था

D) यह व्यापक नेटवर्क में शामिल किया गया था  जिससे कृषि उत्पाद और अन्य सामान वितरित किये गये थे 

Ans. C

Q.4 संस्कृतिकरण से संबंधित निम्नलिखित बयानों पर विचार करें -

1) यह एक प्रक्रिया को दर्शाता है जिससे उच्च स्तर की एक जाति घरेलू और सामाजिक प्रथाओं को अपनालेने  के द्वारा जाति प्रयास के सदस्य अपने स्वयं के सामाजिक स्थिति को बढ़ाते हैं

2) आमतौर पर अनुकरण के लिए चुनी गई प्रथाएं जनेऊ, विशेष प्रार्थना, धार्मिक अनुष्ठान, शाकाहारी भोजन का सेवन आदि हैं 

Options:

A) Only 1 

B) Only 2

C) Both are correct

D) Both are incorrect

Ans. B

Q.5 भारत में युयुत्सुक राष्ट्रवाद के विकास का कारण क्या था?

1) अंग्रेजों का शोषक रवैया

2) भारतीयों में आत्मविश्वास और आत्म सम्मान का विकास 

3) अन्तरराष्टीय प्रभाव 

4) सांप्रदायिकता का विकास 

A) 1,2,3 व 4

B) 1,2 और 3

C) 1 & 4

D) 2,3 और 4

Ans. B

Q.6 कुटागरशाला क्या था जो एक नोकीली छत के साथ एक झोपड़ी थी ?

A)  एक जगह जहां बौद्ध भिक्षावृती के बीच बौद्धिक बहस होती थी 

B) एक जगह जहां जानवरों को रखा जाता था 

C) एक जगह जहां हथियार जमा रहते थे 

D) सोने की जगह

Ans. A

Q.7 1878 की स्थानीय भाषा प्रेस एक्ट के तहत भारतीय भाषा के समाचार पत्रों के दमन की आलोचना निम्न में से किस वजह से हुई ?

A) अंग्रेजी अधिकारियों की भव्य जीवन शैली

B) अंग्रेजी मालिकों द्वारा इंडिगो कार्यकर्ताओं के साथ दुर्व्यवहार करना 

C) 1876-77 के अकाल के पीड़ितों के प्रति अंग्रेजी के अधिकारियों का निर्दय स्वभाव

D)अंग्रेजी अधिकारियों द्वारा भारत के धार्मिक स्थानों का दुरूपयोग

Ans. C

Q.8 शिवाजी की सेना की कुशाग्र बुद्धि के बारे में निम्नलिखित बयानों पर विचार करें:

1) वह गुरिल्ला रणनीति और तेज घुड़सवार सेना युद्ध में मास्टर थे

2) उन्होंने पश्चिमी डेक्कन के पहाड़ों पर दृढ़ गढ़ों की एक श्रृंखला का निर्माण किया.

Codes:

A) Only 1

B) Only 2

C) Both are correct

D) Both are incorrect

Ans. C

Q.9 डलहौजी आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में माने गये हैं क्योंकि उन्होंने कई क्षेत्रों में एक शुरूआत की और क्षेत्रों में सुधार लाए . निम्नलिखित में से कौन से सुधार उनकी योजनाओं में नहीं हैं ?

A) शैक्षिक सुधार

B) एक लोक निर्माण विभाग की स्थापना

C) कारखाने अधिनियम भारतीय श्रम की हालत में सुधार

D) रेलवे के निर्माण के लिए एवं टेलीग्राफ और डाक सेवाओं की शुरूआत

Ans. A

Q.10 अशोक द्वारा प्रचारित 'धम्मा" क्या था ?

A) बौद्ध धर्म के टैनेट्स (tenets) थे

B) अजिविकास  और चर्वकास के दर्शन का एक मिश्रण

C) समय के संप्रदायों के सिद्धांतों के साथ  नैतिकता की एक प्रणाली संगत

D) राज्य की धार्मिक नीति

Ans. C

Q.11 1940 के अगस्त ऑफर 'में लॉर्ड लिनलिथगो द्वारा किया क्या प्रस्ताव थे ?

A) धीरे -धीरे भारत की पूर्ण स्वतंत्रता 

B) डोमिनियन स्थिति

C) प्रांतीय स्वायत्तता

D) केंद्र में प्रतिनिधि सरकार

Ans. B





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