Q.1 वैवल योजना का एक ठोस नतीजा क्या था ? A) उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में एक जनमत संग्रह का आयोजन B) भारतीय संघ में हैदराबाद राज्य का अवशोषण C) 25 जून 1945 को शिमला सम्मेलन का सम्मन करना D) विधानसभा के संविधान का निर्वाचन Ans. C Q.2 निम्नलिखित में से क्या स्वाराज नेताओं के प्रति गांधीजी का रवैया सही ढंग से वर्णन करता है ? A) उन्होंने परिषद में उनके प्रवेश का विरोध नहीं किया था B) वह स्वाराजिस्ट के खिलाफ सरकार की आक्रामकता के प्रति तटस्थ थे और उनके बचाव में नहीं आये C) वह उनके साथ गर्म व्यक्तिगत संबंधों को बनाए रखने के पक्ष में नहीं थे D) उन्हें उनकी नेकनीयती पर पूरा भरोसा था और उन्हें सबसे अधिक महत्वपूर्ण और सम्मानित नेताओं में मानते थे Ans. A Q.3 निम्नलिखित में से क्या क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव हैं ? 1) एक प्रमुख स्थिति के साथ एक भारतीय संघ 2) युद्ध के अंत के बाद एक संविधान सभा बुलाई जानी चाहिए नया संविधान का ढाचा बनाने के लिए 3) भारत की रक्षा (Defence) उस समय ब्रिटिश हाथों में थी A) 1 & 3 B)1,2 & 3 C) 2 & 3 D) 1 only Ans. B

भारत छोड़ो आन्दोलन 9 अगस्त, 1942 ई. को सम्पूर्ण भारत में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के आह्वान पर प्रारम्भ हुआ था। भारत की आज़ादी से सम्बन्धित इतिहास में दो पड़ाव सबसे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण नज़र आते हैं- प्रथम '1857 ई. का स्वतंत्रता संग्राम' और द्वितीय '1942 ई. का भारत छोड़ो आन्दोलन'। भारत को जल्द ही आज़ादी दिलाने के लिए महात्मा गाँधी द्वारा अंग्रेज़ शासन के विरुद्ध यह एक बड़ा 'नागरिक अवज्ञा आन्दोलन' था। 'क्रिप्स मिशन' की असफलता के बाद गाँधी जी ने एक और बड़ा आन्दोलन प्रारम्भ करने का निश्चय ले लिया। इस आन्दोलन को 'भारत छोड़ो आन्दोलन' का नाम दिया गया। स्वतंत्रता की महान लड़ाई
'भारत छोड़ो आन्दोलन' या 'अगस्त क्रान्ति भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन' की अन्तिम महान लड़ाई थी, जिसने ब्रिटिश शासन की नींव को हिलाकर रख दिया। क्रिप्स मिशन के ख़ाली हाथ भारत से वापस जाने पर भारतीयों को अपनी छले जाने का अहसास हुआ। दूसरी ओर दूसरे विश्वयुद्ध के कारण परिस्थितियाँ अत्यधिक गम्भीर होती जा रही थीं। जापान सफलतापूर्वक सिंगापुर, मलाया और बर्मा पर क़ब्ज़ा कर भारत की ओर बढ़ने लगा, दूसरी ओर युद्ध के कारण तमाम वस्तुओं के दाम बेतहाश बढ़ रहे थे, जिससे अंग्रेज़ सत्ता के ख़िलाफ़ भारतीय जनमानस में असन्तोष व्याप्त होने लगा था। जापान के बढ़ते हुए प्रभुत्व को देखकर 5 जुलाई, 1942 ई. को गाँधी जी ने हरिजन में लिखा "अंगेज़ों! भारत को जापान के लिए मत छोड़ो, बल्कि भारत को भारतीयों के लिए व्यवस्थित रूप से छोड़ जाओ।" क्रिप्स मिशन का आगमन
इस समय द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ चुका था, और इसमें ब्रिटिश फ़ौजों की दक्षिण-पूर्व एशिया में हार होने लगी थी। एक समय यह भी निश्चित माना जाने लगा किजापान भारत पर हमला कर ही देगा। मित्र देश, अमेरिका, रूस व चीन ब्रिटेन पर लगातार दबाव डाल रहे थे, कि इस संकट की घड़ी में वह भारतीयों का समर्थन प्राप्त करने के लिए पहल करें। अपने इसी उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए उन्होंने स्टेफ़ोर्ड क्रिप्स को मार्च, 1942 ई. में भारत भेजा। ब्रिटेन सरकार भारत को पूर्ण स्वतंत्रता देना नहीं चाहती थी। वह भारत की सुरक्षा अपने हाथों में ही रखना चाहती थी और साथ ही गवर्नर-जनरल के वीटो अधिकारों को भी पहले जैसा ही रखने के पक्ष में थी। भारतीय प्रतिनिधियों ने क्रिप्स मिशन के सारे प्रस्तावों को एक सिरे से ख़ारिज कर दिया। क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद 'भारतीय नेशनल कांग्रेस कमेटी' की बैठक 8 अगस्त, 1942 ई. को बम्बई में हुई। इसमें यह निर्णय लिया गया कि अंग्रेज़ों को हर हाल में भारत छोड़ना ही पड़ेगा। भारत अपनी सुरक्षा स्वयं ही करेगा और साम्राज्यवाद तथा फ़ाँसीवाद के विरुद्ध रहेगा। यदि अंग्रेज़ भारत छोड़ देते हैं, तो अस्थाई सरकार बनेगी। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध 'नागरिक अवज्ञा आन्दोलन' छेड़ा जाएगा और इसके नेता गाँधी जी होंगे।
वर्धा प्रस्ताव
गाँधी जी ने कांग्रेस को अपने प्रस्ताव को न स्वीकार किये जाने की स्थिति में चुनौती देते हुए कहा कि "मैं देश की बालू से ही कांग्रेस से भी बड़ा आन्दोलन खड़ा कर दूंगा।" 14 जुलाई, 1942 ई. में कांग्रेस कार्यसमिति की वर्धा बैठक में गाँधी जी के इस विचार को पूर्ण समर्थन मिला कि भारत में संवैधनिक गतिरोध तभी दूर हो सकता है, जब अंग्रेज़ भारत से चले जायें। वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति ने 'अंग्रेज़ों भारत छोड़ो प्रस्ताव' पारित किया। आन्दोलन की सार्वजनिक घोषणा से पूर्व 1 अगस्त, 1942 ई. को इलाहाबाद में 'तिलक दिवस' मनाया गया। इस अवसर पर जवाहरलाल नेहरू ने कहा- "हम आग से खेलने जा रहे हैं। हम दुधारी तलवार का प्रयोग करने जा रहे हैं, जिसकी चोट उल्टी हमारे ऊपर भी पड़ सकती है।"
अखिल भारतीय कांग्रेस की बैठक
आन्दोलन के दौरान 8 अगस्त, 1942 ई. को 'अखिल भारतीय कांग्रेस' की बैठक बम्बई के ऐतिहासिक 'ग्वालिया टैंक' में हुई। गाँधी जी के ऐतिहासिक 'भारत छोड़ो प्रस्ताव' को कांग्रेस कार्यसमिति ने कुछ संशोधनों के बाद 8 अगस्त, 1942 ई. की स्वीकार कर लिया। युद्ध की तेयारी में सहयोग देने के प्रस्ताव के साथ-साथ सरकार को तत्काल क़दम उठाने की चुनौती दी गयी। कहा गया कि "भारत की स्वतंत्रता की घोषणा के साथ एक स्थायी सरकार गठित हो जायगी और स्वतंत्र भारत संयुक्त राष्ट्र संघ का एक मित्र बनेगा।"मुस्लिम लीग से वायदा किया गया कि ऐसा संविधान बनेगा, जिसमें संघ में शामिल होने वाली इकाइयों को अधिकाधिक स्वायत्तता मिलेगी और बचे हुए अधिकार उसी के पास रहेंगें। प्रस्ताव का अंतिम अंश था- "देश ने साम्राज्यवादी सरकार के विरुद्ध अपनी इच्छा ज़ाहिर कर दी है। अब उसे उस बिन्दु से लौटाने का बिल्कुल औचित्य नहीं है। अतः समिति अहिंसक ढंग से, व्यापक धरातल पर गाँधी जी के नेतृत्व में जनसंघर्ष शुरू करने का प्रस्ताव स्वीकार करती है।"
मूलमंत्र 'करो या मरो'
कांग्रेस के इस ऐतिहासिक सम्मेलन में महात्मा गाँधी ने लगभग 70 मिनट तक भाषण दिया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि "मैं आपको एक मंत्र देता हूँ, करो या मरो, जिसका अर्थ था- भारत की जनता देश की आज़ादी के लिए हर ढंग का प्रयत्न करे। गाँधी जी के बारे में भोगराजू पट्टाभि सीतारामैया ने लिखा है कि "वास्तव में गाँधी जी उस दिन अवतारऔर पैगम्बर की प्रेरक शक्ति से प्रेरित होकर भाषण दे रहे थे।" 'वह लोग जो कुर्बानी देना नहीं जानते, वे आज़ादी प्राप्त नहीं कर सकते।' भारत छोड़ो आन्दोलन का मूल भी इसी भावना से प्रेरित था। गाँधी जी वैसे तो अहिंसावादी थे, मगर देश को आज़ाद करवाने के लिए उन्होंने 'करो या मरो' का मूल मंत्र दिया। अंग्रेज़ी शासकों की दमनकारी, आर्थिक लूट-खसूट, विस्तारवादी एवं नस्लवादी नीतियों के विरुद्ध उन्होंने लोगों को क्रमबद्ध करने के लिए 'भारत छोड़ो आन्दोलन' छेड़ा था। गाँधीजी ने कहा था कि- "एक देश तब तक आज़ाद नहीं हो सकता, जब तक कि उसमें रहने वाले लोग एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करते।" गाँधी जी के इन शब्दों ने भारत की जनता पर जादू-सा असर डाला और वे नये जोश, नये साहस, नये संकल्प, नई आस्था, दृढ़ निश्चय और आत्मविश्वास के साथ स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। देश के कोने-कोने में 'करो या मरो' की आवाज़ गुंजायमान हो उठी, और चारों ओर बस यही नारा श्रमण होने लगा।
नेताओं की गिरफ़्तारी
9 अगस्त को भोर में ही 'ऑपरेशन ज़ीरो ऑवर' के तहत कांग्रेस के सभी महत्त्वपूर्ण नेता गिरफ्तार कर लिये गये। गाँधी जी को पूना के 'आगा ख़ाँ महल' में तथा कांग्रेस कार्यकारिणी के अन्य सदस्यों को अहमदनगर के दुर्ग में रखा गया। कांग्रेस को अवैधानिक संस्था घोषित कर ब्रिटिश सरकार ने इस संस्था की सम्पत्ति को जब्त कर लिया और साथ में जुलूसों को प्रतिबंधित कर दिया। सरकार के इस कृत्य से जनता में आक्रोश व्याप्त हो गया। जनता ने स्वयं अपना नेतृत्व संभाल कर जुलूस निकाला और सभाऐं कीं। स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान यह पहला आन्दोलन था, जो नेतृत्व विहीनता के बाद भी उत्कर्ष पर पहुँचा। सरकार ने जब आन्दोलन को दबाने के लिए लाठी और बंन्दूक का सहारा लिया तो आन्दोलन का रूख बदलकर हिसात्मक हो गया। अनेक स्थानों पर रेल की पटरियाँ उखाड़ी गईं और स्टेशनों में आग लगा दी गई। बम्बई, अहमदाबाद एवं जमशेदपुरमें मजदूरों ने संयुक्त रूप से विशाल हड़ताल कीं। संयुक्त प्रांत में बलिया एवं बस्ती, बम्बई में सतारा, बंगाल में मिदनापुर एवं बिहार के कुछ भागों में 'भारत छोड़ो आन्दोलन' के समय अस्थायी सरकारों की स्थापना की गयी। इन स्वाशासित समानान्तर सरकारों में सर्वाधिक लम्बे समय तक सरकार सतारा तक थी। यहाँ पर विद्रोह का नेतृत्व नाना पाटिल ने किया था। सतारा के सबसे महत्त्वपूर्ण नेता वाई.बी. चाह्नाण थे। पहली समान्तर सरकार बलिया में चितू पाण्डेय के नेतृत्व में बनी। बंगाल के मिदनापुर ज़िले में तामलुक अथवा ताम्रलिप्ति में गठिन राष्ट्रीय सरकार 1944 ई. तक चलती रही। यहाँ की सरकार को जातीय सरकार के नाम से जाना जाता है। सतीश सावंत के नेतृत्व में गठित इस जातीय सरकार ने स्कूलों को अनुदान दिये और 'सशस्त्र विद्युत वाहिनी सैन्य संगठन' बनाया। इस आन्दोलन से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र थे- बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, मद्रास एवं बम्बई। जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया एवं अरुणा असिफ़ अली जैसे नेताओं ने भूमिगत रहकर इस आन्दोलन को नेतृत्व प्रदान किया। बम्बई में उषा मेहता एवं उनके कुछ साथियों ने कई महीने तक कांग्रेस रेडियो का प्रसारण किया। राममनोहर लोहिया नियमित रूप से रेडियो पर बोलते थे। नवम्बर 1942 ई. में पुलिस ने इसे खोज निकाला और जब्त कर लिया।
गाँधी जी का प्रभाव
'भारत छोड़ो आन्दोलन' मूल रूप से एक जनांदोलन था, जिसमें भारत का हर जाति वर्ग का व्यक्ति शामिल था। इस आन्दोलन ने युवाओं को एक बहुत बड़ी संख्या में अपनी ओर आकृष्ट कर लिया। युवाओं ने अपने कॉलेज छोड़ दिये और वे जेल का रास्ता अपनाने लगे। जिस दौरान कांग्रेस के नेता जेल में थे, ठीक इसी समय मोहम्मद अली जिन्ना तथा मुस्लिम लीग के उनके साथी अपना प्रभाव क्षेत्र फ़ैलाने में लग गये। इसी वर्ष में मुस्लिम लीग को पंजाब और सिंध में अपनी पहचान बनाने का मौक़ा मिला, जहाँ पर उसकी अभी तक कोई ख़ास पहचान नहीं थी। जून 1944 ई. में जब विश्वयुद्ध समाप्ति की ओर था, गाँधी जी को जेल से रिहा कर दिया गया। जेल से निकलने के बाद उन्होंने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच फ़ासले को पाटने के लिए जिन्ना के साथ कई बार मुलाकात की और उन्हें समझाने का प्रयत्न किया। इसी समय 1945 ई. में ब्रिटेन में 'लेबर पार्टी' की सरकार बन गई। यह सरकार पूरी तरह से भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में थी। उसी समय वायसराय लॉर्ड वेवेल ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों के बीच कई बैठकों का आयोजन किया।
आन्दोलन की आलोचना
तत्कालीन भारतीय राजनीतिक दलों में 'साम्यवादी दल' ने इस आन्दोलन की आलोचना की। मुस्लिम लीग ने भी 'भारत में छोड़ो आन्दोलन' की आलोचना करते हुए कहा कि "आन्दोलन का लक्ष्य भारतीय स्वतन्त्रता नहीं, वरन भारत में हिन्दू साम्राज्य की स्थापना करना है, इस कारण यह आन्दोलन मुसलमानों के लिए घातक है।" मुस्लिम लीग तथा उदारवादियों को भी यह आन्दोलन नहीं भाया। सर तेज़बहादुर सप्रू ने इस प्रस्ताव को 'अविचारित तथा असामयिक' बताया। भीमराव अम्बेडकर ने इसे 'अनुत्तरदायित्व पूर्ण और पागलपन भरा कार्य' बताया। 'हिन्दू महासभा' एवं 'अकाली आन्दोलन' ने भी इसकी आलोचना की। यह आन्दोलन संगठन एवं आयोजन में कमी, सरकारी सेवा में कार्यरत उच्चाधिकारियों की वफ़ादारी व आन्दोलनकारियों के पास साधन एवं शक्ति के अभाव के कारण पूर्ण रूप में सफल नहीं हो सका।
केबिनेट मिशन की असफलता
गाँधी जी ने 'भारत छोड़ो आन्दोलन' को बहुत ही सुनियोजित ढंग से चलाने की रूपरेखा तैयार की थी। उन्होंने कहा, 'हम या तो भारत को आज़ाद करवाएंगे या इस कोशिश में मिट जाएंगे।' भारत में 1946 ई. के प्रारम्भ में प्रांतीय विधान मंडलों के लिए नए सिरे से चुनाव सम्पन्न हुए। इन चुनावों में कांग्रेस को भारी सफलता प्राप्त हुई। मुस्लिमों के लिए आरक्षित सीटों पर मुस्लिम लीग को भारी बहुमत प्राप्त हुआ। इसी समय 1946 ई. की गर्मियों में कैबिनेट मिशन भारत पहुँचा। मिशन ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग को एक ऐसी संघीय व्यवस्था पर राज़ी करने की कोशिश की, जिसमें भारत के अन्दर विभिन्न प्रांतों को सीमित स्वायत्तता दी जाये। लेकिन कैबिनेट मिशन का यह प्रयास असफल सिद्ध हुआ। इस मिशन के असफल हो जाने के कारण जिन्ना ने पाकिस्तान की स्थापना के लिए लीग की माँग के समर्थन में एक प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस का ऐलान किया।16 अगस्त, 1946 ई. का दिन इसके लिये नियत किया गया था, लेकिन उसी दिन कलकत्ता में संघर्ष शुरू हो गया। यह हिंसा कलकत्ता से प्रारम्भ होकर बंगाल, बिहार और पंजाब तक फैल गई। कई स्थानों पर हिन्दू, तो कई स्थानों पर मुस्लिमों को निशाना बनाया गया।
आन्दोलन का प्रभाव
'भारत छोड़ो आन्दोलन' भारत को स्वतन्त्र भले न करवा पाया हो, लेकिन इसका दूरगामी परिणाम सुखदायी रहा। इसलिए इसे "भारत की स्वाधीनता के लिए किया जाने वाला अन्तिम महान प्रयास" कहा गया। अगस्त, 1942 ई. के विद्रोह के बाद प्रश्न सिर्फ़ यह तय करना था कि स्वतंत्रता के बाद सरकार का स्वरूप क्या हो? 1942 ई. के आन्दोलन की विशालता को देखते हुए अंग्रेज़ों को विश्वास हो गया था कि उन्होंने शासन का वैद्य अधिकार खो दिया है। इस आन्दोलन ने विश्व के कई देशों को भारतीय जनमानस के साथ खड़ा कर दिया। चीन के तत्कालीन मार्शल च्यांग काई शेक ने 25 जुलाई, 1942 ई. को संयुक्त राज्य अमेरीका के राष्ट्रपतिरूजवेल्ट को पत्र में लिखा, "अंग्रेज़ों के लिए सबसे श्रेष्ठ नीति यह है कि वे भारत को पूर्ण स्वतन्त्रता दे दें।" रूजवेल्ट ने भी इसका समर्थन किया। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने आन्दोलन के बारे लिखा- "भारत में ब्रिटिश राज के इतिहास में ऐसा विप्लव कभी नहीं हुआ, जैसा कि पिछले तीन वर्षों में हुआ, लोगों की प्रतिक्रिया पर हमें गर्व है।" सरकार ने 13 फ़रवरी, 1943 ई. को 'भारत छोड़ो आन्दोलन' के समय हुए विद्रोहों का पूरा दोष महात्मा गाँधी एवं कांग्रेस पर थोप दिया। गाँधी जी ने इन बेबुनियाद दोषों को अस्वीकार करते हुए कहा कि "मेरा वक्तव्य अहिंसा की सीमा में था।" उन्होंने कहा कि- "स्वतन्त्रता संग्राम के प्रत्येक अहिंसक सिपाही को काग़ज़ या कपड़े के एक टुकड़े पर 'करो या मरो' का नारा लिखकर चिपका लेना चाहिए, जिससे यदि सत्याग्रह करते समय उसकी मृत्यु हो जाए तो उसे इस चिह्न के आधार पर दूसरे तत्त्वों से अलग किया जा सके, जिनका अहिंसा में विश्वास नहीं है।" गाँधी जी ने अपने ऊपर लगे आरोपों को सिद्ध कराने के लिए सरकार से निष्पक्ष जांच की मांग की। सरकार के इस ओर ध्यान न देने पर 10 फ़रवरी, 1943 ई. से उन्होंने 21 दिन का उपवास शुरू कर दिया। उपवास के तेरहवें दिन ही गाँधी जी की स्थिति बिल्कुल नाजुक हो गयी। ब्रिटिश भारत की सरकार उन्हें मुक्त न करके उनकी मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगी। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि 'आगा ख़ाँ महल' में उनके अन्तिम संस्कार के लिए चन्दन की लकड़ी की व्यवस्था भी कर दी गयी थी। सरकार की इस बर्बर नीति के विरोध में वायसराय की कौंसिल के सदस्य सर मोदी, सर ए.एन. सरकार एवं आणे ने इस्तीफ़ा दे दिया।
माउंटबेटन की घोषणा
लॉर्ड वावेल के स्थान पर लॉर्ड माउंटबेटन को फ़रवरी 1947 ई. में भारत का वायसराय नियुक्त कर दिया गया। माउंटबेटन ने हिन्दू और मुस्लिमों में अंतिम दौर की वार्ता का माहौल तैयार किया। जब सुलह के लिए उनका प्रयास भी विफ़ल हो गया तो, उन्होंने ऐलान कर दिया कि ब्रिटिश भारत को स्वतंत्रता दे दी जाएगी, लेकिन उसका विभाजन भी होगा। सत्ता हस्तांतरण के लिए 15 अगस्त का दिन निश्चित किया गया। उस दिन भारत के विभिन्न भागों में लोगों ने जमकर खुशियाँ मनायीं। दिल्ली में जब संविधान सभा के अध्यक्ष ने मोहनदास करमचंद गाँधी को राष्ट्रपिता की उपाधि देते हुए संविधान सभा की बैठक शुरू की तो बहुत देर तक मधुर ध्वनि चारों ओर विद्यमान रही। बाहर जमा भीड़ गाँधीजी के जयकारे लगा रही थी।
आज़ादी की प्राप्ति
देश की राजधानी दिल्ली में जो उत्सव 15 अगस्त-1947 को मनाये जा रहे थे, उनमें महात्मा गाँधी शामिल नहीं थे। वे इस समय कलकत्ता में थे। उन्होंने वहाँ पर भी किसी कार्यक्रम में भाग नहीं लिया, क्योंकि उन्होंने इतने दिन तक जिस स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया था, वह एक बहुत बड़ी कीमत पर प्राप्त हुई थी। राष्ट्र का विभाजन उनके लिये किसी बुरे सपने से कम नहीं था। हिन्दू और मुसलमान एक-दूसरे की गर्दन काटने पर आमादा थे। गाँधी जी ने हिन्दू, सिक्ख और मुस्लिमों से कहा कि अतीत को भुलाकर अपनी पीड़ा पर ध्यान देने के बजाय एक-दूसरे के साथ आपसी भाईचारे की मिसाल को अपनायें।
Q.4  निम्नलिखित में से क्या 'सांप्रदायिक पुरस्कार' के प्रावधान थे?

1) दलित वर्ग के सदस्यों को आरक्षित सीट और पृथक निर्वाचक मंडल सौंपा गया

2) मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल

3) पृथक निर्वाचक मंडल गोरों और सिखों के लिए 

4) पृथक निर्वाचक मंडल 10 साल के अंत में समाप्त हो जाएगा

Codes:

A) 1,3,4

B) 2,3,4

C) 1,2,3

D) 1,2,3,4

Ans. C

Q.5  तंजौर में ब्रीहादेशवर मंदिर के बारे में कौन सा कथन सही है ?

A) मंदिर चोल स्थापत्य कला का एक शानदार उदाहरण है.

B) मंदिर का ग्रेनाइट से निर्माण किया है.

C) यह सम्राट राजराजा द्वारा बनाया गया है

D) मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित एक स्मारक है

Ans. D

Q.6 स्वदेशी आंदोलन के बारे में बयानों पर विचार करें :

1) यह ब्रिटिश साम्राज्य को दूर करने और भारत में आर्थिक स्थिति में सुधार लाने के उद्देश्य से एक आर्थिक रणनीति के साथ शुरू किया गया है

2) इसमें विभाजन के खिलाफ भारत में और साथ ही ब्रिटेन में लोगों की राय को पलटने के लिए विभिन्न तरह के विरोध जैसे की याचिकाएं, सार्वजनिक बैठक, प्रेस अभियान के रूप में उदारवादी तकनीक द्वारा चिह्नित किया है

3) इसमें ब्रिटिश उत्पादों का बहिष्कार किया है

Codes:

A) 1 & 3

B) 2 & 3

C) 1 & 2

D) 1,2,3

Ans. D

स्वदेशी आन्दोलन भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का एक महत्वपूर्ण आन्दोलन, सफल रणनीति व दर्शन था। स्वदेशी का अर्थ है - 'अपने देश का'। इस रणनीति के लक्ष्य ब्रिटेन में बने माल का बहिष्कार करना तथाभारत में बने माल का अधिकाधिक प्रयोग करके साम्राज्यवादी ब्रिटेन को आर्थिक हानि पहुँचाना व भारत के लोगों के लिये रोजगार सृजन करना था। यह ब्रितानी शासन को उखाड़ फेंकने और भारत की समग्र आर्थिक व्यवस्था के विकास के लिए अपनाया गया साधन था। वर्ष 1905 के बंग-भंग विरोधी जनजागरण से स्वदेशी आन्दोलन को बहुत बल मिला। यह 1911 तक चला और गान्धीजी के भारत में पदार्पण के पूर्व सभी सफल अन्दोलनों में से एक था। अरविन्द घोष, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, वीर सावरकर, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय स्वदेशी आन्दोलन के मुख्य उद्घोषक थे।[1] आगे चलकर यही स्वदेशी आन्दोलन महात्मा गांधी के स्वतन्त्रता आन्दोलन का भी केन्द्र-बिन्दु बन गया। उन्होने इसे "स्वराज की आत्मा" कहा। स्वदेशी आन्दोलन विशेषकर उस आन्दोलन को कहते हैं जो बंग-भंग के विरोध में न केवल बंगाल अपितु पूरे ब्रिटिश भारत में चला। इसका मुख्य उद्देश्य अपने देश की वस्तु अपनाना और दूसरे देश की वस्तु का बहिष्कार करना था। यद्यपि स्वदेशी का यह विचार बंग-भंग से बहुत पुराना है। भारत में स्वदेशी का पहले-पहल नारा बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने "वंगदर्शन" के 1279 की भाद्र संख्या यानी 1872 ई. में ही विज्ञानसभा का प्रस्ताव रखते हुए दिया था। उन्होंने कहा था-"जो विज्ञान स्वदेशी होने पर हमारा दास होता, वह विदेशी होने के कारण हमारा प्रभु बन बैठा है, हम लोग दिन ब दिन साधनहीन होते जा रहे हैं। अतिथिशाला में आजीवन रहनेवाले अतिथि की तरह हम लोग प्रभु के आश्रम में पड़े हैं, यह भारतभूमि भारतीयों के लिए भी एक विराट अतिथिशाला बन गई है।"
Q.7 निम्नलिखित में से क्या क्रिप्स मिशन के उद्देश्य थे ?

1) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ चर्चा करना एक सौदे के लिए युद्ध के दौरान कुल सहयोग प्राप्त करने के लिए 

2) एक निर्वाचित भारतीय विधायिका को शीर्ष और वायसराय से अधिकार का वितरण करने के लिए 

Codes:

A) Only 1

B) Only 2

C) Both are correct

D) Both are incorrect

Ans. C

Q.8 भारत छोड़ो आंदोलन के संबंध में बयानों पर विचार करें:

1) यह सत्याग्रह के जवाब में अगस्त 1942 में भारत में शुरू की एक सविनय अवज्ञा आंदोलन था

2) ब्रिटिश को वायसराय के परिषद, मुसलमान, कम्युनिस्ट पार्टी, रियासतों, इंपीरियल और राज्य पुलिस, भारतीय सेना और भारतीय सिविल सेवा का समर्थन था

Codes:

A) Only 1

B) Only 2

C) Both are correct

D) Both are incorrect

Ans. C







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